Ayodhya Ram Mandir: सरयू से जानिये अयोध्या की मुक्ति के संघर्ष की दास्तां। जब मुक्ति में चार दिन बचे थे, तभी एक और मुकदमे ने उलझा दिया। अचानक खबर मिली कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की तरफ से मो. हाशिम अंसारी ने पूरे परिसर पर मालिकना हक का दावा कर दिया है।
गोपाल सिंह विशारद के मुकदमे में न्यायालय के अंतरिम आदेश से जन्मस्थान पर रामलला का बिना किसी बाधा के दर्शन-पूजन का रास्ता साफ हो गया था। विशारद और महंत रामचंद्र दास परमहंस का राम जन्मस्थान हिंदुओं को सौंपने वाले दो मुकदमे विचाराधीन थे।
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उच्च न्यायालय के 1955 में दोनों मुकदमों को जल्द निस्तारित करने के निर्देश से उम्मीद जगी थी, कि शायद विवाद पर पूरी तरह विराम लग जाए। जन्मस्थान सौंपने के मुकदमे को नौ साल हो चले थे। दीवानी मुकदमों में 12 साल के भीतर यदि कोई प्रतिवादी दावे को चुनौती नहीं देता है, तो मुकदमा वादी के पक्ष में निर्णीत हो जाता है।
मैं खुश थी कि आने वाले दिनों में राम जन्मस्थान विवादों से मुक्त हो जाएगा। साल चल रहा था 1959 का। मामले में निर्मोही अखाड़े का प्रवेश हुआ। उसने परिसर पर मालिकाना हक का दावा किया। तर्क दिया कि 1885 में जिला न्यायालय में इस स्थान पर राम चबूतरे पर निर्माण तथा छत्र लगाने का दावा करने वाले महंत रघुवर दास निर्मोही अखाड़े के ही महंत थे। पूरे परिसर पर उसी का दावा साबित होता है।
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साल आ पहुंचा था 1961...महीना था दिसंबर। विशारद व परमहंस के केस को 12 साल पूरे होने वाले थे। इसे चुनौती देने की निर्धारित अवधि पूरी होने में 4 दिन ही बचे थे। तीसरे केस को लेकर मैं बहुत चिंतित नहीं थी। निर्मोही अखाड़े के केस में भी मंदिर का ही दावा था। मुझे तो जन्मस्थान से मतलब था। चाहे वह निर्मोही अखाड़ा करता या परमहंस का पक्ष।
मैं उल्लासित थी कि चार दिन बाद जन्मस्थान हमेशा-हमेशा के लिए विवादों से मुक्त हो जाएगा। अचानक खबर मिली कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड की तरफ से मो. हाशिम अंसारी ने पूरे परिसर पर मालिकना हक का दावा कर दिया है। वही हाशिम, जो परमहंस से जिगरी दोस्ती के चलते चर्चित रहे।
मुतवल्ली ने कहा ढांचा स्थानांतरित कर दो
हाशिम अंसारी ने मांग की कि रामलला की मूर्ति हटाकर ढांचे को हिंदुओं के अधिकार से लेकर मुसलमानों को सौंपा जाए। मजेदार बात यह है कि कथित विवादित ढांचा एक शिया मस्जिद थी। पर, हाशिम के जरिये मालिकाना हक का दावा किया सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड ने। दूसरा रोचक तथ्य यह कि मस्जिद के मुतवल्ली थे, मीर जावेद हसन।
सुन्नी वक्फ बोर्ड ने जावेद से संपर्क किया तो उन्होंने मुकदमा दायर करने से इन्कार कर दिया। उल्टे जावेद ने मांग की कि ढांचे को अयोध्या से 10 किमी दूर उनके गांव में स्थानांतरित कर दिया जाए। इससे वे बिना रोकटोक उसमें नमाज पढ़ सकेंगे और रामभक्त जन्मस्थान पर बिना विघ्न-बाधा के रामलला की पूजा कर सकेंगे।
पर, जावेद की बात नहीं मानी गई। यह याद दिलाना जरूरी है कि 1950 से लेकर 1961 तक मंदिर-मस्जिद को लेकर 4 मुकदमे हो चुके थे। इसमें एक मस्जिद के दावे का और तीन मंदिर के। एक पांचवां मुकदमा और हुआ, लेकिन उसके बारे में बात आगे।