रूस और यूक्रेन के बीच जंग का आज नौवां दिन है। रूस की सेना यूक्रेन को चारों ओर से घेर रही है। दिन रात मिसाइलों और बम से हमला किया जा रहा है। हजारों भारतीय छात्र-छात्राएं यूक्रेन के कई शहरों में फंसे हुए हैं।
केंद्र सकरार उन्हें निकालने का प्रयास कर रही है, लेकिन हम आपको पढ़ाने जा रहे हैं यूक्रेन की युद्ध भूमि से निकलकर भारत आए राजस्थानी विद्यार्थियों के संघर्ष की कहानी। इन विद्यार्थियों ने बमबारी के बीच बंकर में रहकर, पैदल चलकर और खाने की कमी के साथ कैसे वतन वापसी की आइए आपको पढ़ाते हैं....
छह दिन बंकर में बिताए, फिर हिम्मत जुटाकर हंगरी तक पहुंचे
सीकर के साहिल चार साल से यूक्रेन में रहकर एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे थे, लेकिन रसिया के हमले के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। रूसी सेना के हमले के बाद हालात बिगड़े तो साहिल बंकर में आए गए। 24 फरवरी से 2 मार्च यानी छह दिन उसने बंकर में ही बिताए। इसके बाद हिम्मत जुटाकर साहिल अपने 12 साथियों के साथ खारकीव से हंगरी पहुंचे। इसके लिए उन्होंने पैदल, ट्रेन या जो भी साधन मिला उससे सफर किया।
साहिल ने कहा कि बिना खाने-पीने और भारी गोला बारी के बीच छह दिन हमें दशहत में बिताए, एक-एक दिन गिन-गिनकर कट रहा था। हिम्मत जुटाकर 12 साथियों के साथ खारकीव से हंगरी तक का सफर अपने दम पर किया। हंगरी से भारत सरकार ने एयर लिफ्ट से सकुशल भारत पहुंचाया। घर आने पर साहिल का परिजनों और आसपास के लोगों ने फूल माला पहनाकर स्वाग किया।
जिंदा वापस पहुंचा लग रहा था मुश्किल, रूसी सेना से बॉर्डर तक छोड़ा
बीकानेर के वृंदावन एंक्लेव में रहने वाली शिवांगी अब अपने घर में माता-पिता के साथ है, लेकिन यूक्रेन के हालातों पर बात करते हुए उसकी आंखों में आंसू आ जाते हैं। शिवांगी ने बताया कि मैं 25 भारतीय छात्र -छात्राओं के साथ ल्वीव शहर में फंसी हुई थी। शहर में फटने वाले बम आवाज हमें सुनाई देती रहती थी। इसके बाद हम सभी 25 छात्र-छात्राएं ने ल्वीव से निकलकर पोलैंड जाने का फैसला किया। पांच टैक्सियों से हम सभी पेालैंड बॉर्डर के लिए निकले। टैक्सी चालकों ने बॉर्डर से 30 किमी दूर उतार दिया।
आंखों में भरे आंसू रोकती हुई शिवांगी कहती है कि 10 किमी पैदल चलने के बाद लगा कि अब हमारा जिंदा वापस पहुंचना मुश्किल है। आसपास गोलियां और तेज धमाकों की आवाज सुनाई दे रही थी, और हम पैदल बॉर्डर की ओर बढ़ रहे थे। इस दौरान रूसी सेना मिला और उन्होंने अपने वाहनों में बैठाकर हमें बॉर्डर से कुछ दूर पहले उतार दिया। इसके बाद हम पोलैंड पहुंचे और वहां से भारत आए। शिवांगी के पिता दिनेश शर्मा ने नम आंखों से कहा कि मेरी बेटी सुरक्षित घर आ गई, अब और हमें क्या चाहिए।
यूक्रेन में मौत के मंजर को हम याद भी नहीं करना चाहते
युद्ध के बीच यूक्रेन में फंसे टोंक के आयुष गौतम और रित्विक बजाज घर आ गए हैं। ऑपरेशन गंगा के तहत दोनों छात्रों की वतन वापसी हुई है। आयुष और रित्विक कहते हैं कि मिसाइल, टैंक और बम के धमाकों की आवाज सुनकर मन में दहशत बैठ गई थी। युद्ध के हालातों से निकलकर आना हमारे लिए पुनर्जन्म से कम नहीं है। यूक्रेन में मौत के मंजर को हम बार-बार याद याद भी नहीं करना चाहते, लेकिन वहां के हालात हमारे जहन में बस गए हैं।
इधर, रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने के बाद दोनों के माता-पिता की चिंता बढ़ गई थी। परिजनों का खाना पीना छूट गया था, लेकिन अपने बच्चों को सामने देख उनकी खुशी का ठिकाना नहीं है। बच्चों की वतन वापसी पर परिजनों ने केंद्र और राज्य सरकार का आभार जताया है।