राजस्थान विधानसभा चुनाव 2018 के रण में कांग्रेस स्पष्ट बहुमत हासिल करने की ओर बढ़ती दिख रही है। लेकिन पार्टी राजस्थान में अपने पूर्व के अनुमान के मुताबिक बड़ी जीत हासिल करने से पीछे रह गई। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजस्थान के चुनावी मैदान में उतरने के कारण ऐसा हुआ।
मोदी की रैलियों के कारण बीजेपी ने राजस्थान में सम्मानजनक सीटें हासिल कर यहां अपनी इज्जत बचाने में कामयाब रही। पीएम मोदी ने राजस्थान में एक दर्जन रैली कर चुनावी फिजा को भाजपा की ओर मोड़ने में काफी हद तक सफलता पाई। इस समय भाजपा राजस्थान में 70 सीटों के आसपास पहुंचती दिख रही है। अगर अंतिम चुनाव परिणाम में उसके 70-75 विधायक भी जीतकर आते हैं तो वह विधानसभा में एक मजबूत विपक्षी दल की भूमिका निभा सकेगी। यह भी माना जा रहा है कि अगर पीएम खुद राजस्थान में इतनी कैम्पेनिंग न करते तो भाजपा 40 से 50 सीटों के बीच सिमटकर रह जाती जिसका लोकसभा चुनावों पर बहुत ज्यादा नकारात्मक असर पड़ता।
भारतीय जनता पार्टी के अपने आकलन में भी यह बात सामने आई थी कि पांचों चुनावी राज्यों में राजस्थान उसके लिए सबसे ज्यादा कठिन होने जा रहा है। यही कारण है कि पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने इसे अपनी प्राथमिकता में सबसे ऊपर रखा। उन्होंने लगातार राजस्थान में कैम्प किये रखा और ताबड़तोड़ 14 चुनावी रैलियों को सम्बोधित किया। अंतिम समय में उन्होंने अपने सबसे बड़े स्टार प्रचारक पीएम नरेंद्र मोदी को मैदान में उतार दिया। मोदी के मैदान में उतरते ही कई बार यह एहसास हुआ कि वे गुजरात की तर्ज पर यहां भी अंतिम क्षणों में जनता के मूड में बदलाव कर सकेंगे। कई बार वे ऐसा सन्देश देने में सफल भी रहे लेकिन अंततः भाजपा जीत से कुछ कदम पहले ही ठिठक कर रुक गई।
माना जा रहा है कि राजस्थान में भाजपा के सम्मानजनक स्कोर हासिल करने के पीछे उसका वसुंधरा राजे सिंधिया के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फैसला भी रहा। सिंधिया को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट कर चुनाव लड़ने की बदौलत ही वह उसके समर्थकों को जोड़े रह सकी और एक इज्जतदार स्कोर हासिल कर सकी। अगर पार्टी ने सिंधिया को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट न किया होता तो अनिश्चितता की स्थिति में वसुंधरा के वफादार दूसरी तरफ मुड़ सकते थे जो पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता था।