नव संकल्प शिविर में जितने भी प्रस्ताव पारित हुए उन सबसे ऊपर अशोक गहलोत का प्रबंधन रहा। कांग्रेस पार्टी में अगर नजर घूमाते हुए देखें तो गहलोत जैसा कद्दावर नेता और कोई नहीं है। कांग्रेस पार्टी में सिर्फ अशोक गहलोत ही मुखर हो कर राहुल गांधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने की बात भी करते नजर आते हैं। आज की राजनीतिक समीकरण को देखते हुए लगता है कि अशोक गहलोत ने सचिन पायलट के लिए कांग्रेस में सारे दरवाजे राजस्थान के लिहाज से तो बंद कर दिए हैं।
पायलट के सवाल को लेकर भी आलाकमान का कोई संदेश या जवाब नहीं है। नव संकल्प शिविर में भी पायलट की राजस्थान में क्या भूमिका होगी, अभी तक कुछ साफ नहीं है और ना ही पायलट को लेकर कोई बयान आया है।
शिविर से पहले चर्चा जरूर थी कि शायद पायलट को प्रदेश अध्यक्ष बना दिया जाए, लेकिन अब वो भी ठंडे बस्ते में है। दूसरी तरफ गहलोत के खास माने जाने वाले डोटासरा भी अभी अध्यक्ष पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं। गहलोत के साथ हर मंच पर नजर आ रहे डोटासरा भी मजबूत नजर आ रहे हैं।
डोटासरा के पास रहेगी बड़ी जिम्मेदारी
नव संकल्प शिविर का समापन भाषण ने भी डोटासरा को और मजबूत बना दिया है। डोटासरा पांच साल यानी जुलाई 2025 तक अध्यक्ष रह सकते हैं। इसका साफ मतलब है कि 2023 के चुनाव की बड़ी जिम्मेदारी डोटासरा के पास ही होनी है। चुनाव में सबसे बड़ी जिम्मेदारी है टिकट वितरण की। इस परिस्थिति में पायलट समर्थकों की मुश्किलें और भी बढ़ सकती हैं।
पायलट को लेकर आलाकमान का रुख साफ नहीं
सचिन पायलट राजस्थान से बाहर जाने को तैयार नहीं हैं। पायलट के पास कोई भी पद नहीं है और सबसे बड़ी बात ये है कि कोई चर्चा करने वाला भी नहीं है। ये परिस्थिति पायलट और उनके समर्थकों को कितना मजबूत बनती है या राजनीतिक महात्वाकांक्षा पायलट समर्थकों को गहलोत खेमे की तरफ झुकाती है समय के साथ तय होगा। लेकिन, गहलोत खेमे में जाने के बाद भी सवाल विश्वास का होगा कि इनपर कितना विश्वास किया जा सकता है।
साल 2020 में पायलट की बगावत के समय गहलोत ने सही समय पर संकट को भांपते हुए 109 विधायकों का समर्थन हासिल कर लिया था। परिणाम यह निकला कि पायलट खेमे को सुलह करनी पड़ी। राजस्थान कांग्रेस के अंदर मचे सियासी घमासान में अशोक गहलोत एक बार फिर सचिन पायलट पर भारी पड़ते हुए दिखाई दे रहे हैं।
राजस्थान में सियासत के बादशाह माने जाने वाले हरदेव जोशी, परसराम मदेरणा, नटवर सिंह, शिवचरण सिंह माथुर और सीपी जोशी समेत तमाम सियासी नेताओं को गहलोत सियासी शिकस्त देने में सफल रहे हैं। गहलोत को मात देना राजस्थान की राजनीति में अभी तो आसान नहीं है।