‘नेता भी चले रे, कलेक्टर भी चले रे, धकापेल चले, दिल्ली में भारत सरकार, जवाबदेही यात्रा जिंदाबाद...’ ये उन तीन लाख आदिवासियों और मजदूरों की आवाज है, जो 100 दिनों तक राजस्थान के 33 जिलों में गूंजी।
बृहस्पतिवार को करीब आठ हजार लोगों ने फिलहाल जयपुर में विधानसभा के सामने प्रदर्शन कर राज्य में जवाबदेही कानून बनाने की मांग की, लेकिन इनका कहना है कि अभी हमारा आंदोलन शुरू हुआ है और यह तब तक जारी रहेगा जब तक केंद्र व अन्य राज्यों में भी यह कानून न बन जाए।
इस पूरे मुहिम की अगुवाई करने वाली सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय और निखिल डे ने अमर उजाला को बताया कि जवाबदेही कानून बनाने के लिए राज्यों के साथ ही केंद्र पर भी दबाव देंगे। इस कानून के बन जाने के बाद आम आदमी के हाथ में और ताकत आ जाएगी।
अरुणा ने बताया कि सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार जैसे जनता से जुड़े कानून तो बहुत हैं, लेकिन उन्हें लागू करने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते हैं। इसलिए जवाबदेही कानून में इसकी मांग की जा रही है कि जो अधिकारी या मंत्री अपना काम ठीक से नहीं करते हैं, उन पर कार्रवाई की जाए अथवा जुर्माना जाए। इस कानून में बड़े अधिकारियों और मंत्रियों की जवाबदेही सीधे तय होगी। केंद्र सरकार जानबूझ कर इस कानून को नजरंदाज कर रही है।
अरुणा का कहना है कि आरटीआई एक्ट की तरह जवाबदेही कानून को लेकर राजस्थान से लेकर केंद्र और अन्य राज्यों में लंबा संघर्ष चलेगा। निखिल डे ने बताया, ‘हमने जवाबदेही कानून की मांग के लिए सभी राजनैतिक दलों के लोगों को निमंत्रण दिया था। हमने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को भी बुलाया था, लेकिन वह नर्हीं आइं और न ही कोई भाजपा का नेता आंदोलन में हिस्सा लेने आया।’