देश भले ही 21वीं सदी में हो मगर एक तबका ऐसा भी है जो अपना जीवन 18वीं सदी के पिछड़ेपन में जी रहा है। यह तबका है राजस्थान के बारां जिले में रहने वाली सहरिया जनजाति। 2001 के अकाल में बारां के शाहाबाद क्षेत्र में रहने वाला यह तबका चर्चा में तब आया जब भुखमरी से 47 लोगों की मौत हो गई थी। सरकारें आईं और गईं मगर बेरोजगारी, गरीबी और कुपोषण इस जनजाति की समस्या बनी हुई है।
70 हजार की आबादी वाली यह जनजाति अति पिछड़े समुदायों में से एक हैं। इस तबके के लोगों की मानें तो इस पिछड़ेपन के बावजूद इन्हें मनरेगा और अंत्योदय योजना का पूरा लाभ नहीं मिल पाया। दैनिक मजदूरी यहां के लोगों का मुख्य पेशा है।
इस जनजाति के कार्यकर्ता लखन सहरिया के मुताबिक मनरेगा का पैसा भी समय पर नहीं मिलना एक समस्या है। सहरिया जनजाति के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है मगर अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। बारां अटरू के कांग्रेस उम्मीदवार पानाचंद मेघवाल के मुताबिक कांग्रेस की गहलोत सरकार ने 1999 में सहरिया लोगों के लिए आरक्षण लागू करके इनके लिए अवसर के नए रास्ते खोले।
मेघवाल आरोप लगाते हुए कहते हैं कि भाजपा सरकार की गरीब विरोधी नीतियों के कारण इस क्षेत्र में कई परिवारों को राशन के रूप में मिलने वाला 25 किलो गेहूं नहीं मिल पा रहा है। भाजपा को मंदिर मुद्दा याद है मगर गरीबों के विकास के कार्य नहीं।
सहरिया जनजाति पारंपरिक तौर पर कांग्रेस को वोट करती आई है मगर 2013 में किशनगंज की आरक्षित सीट पर भाजपा ने जीत हासिल की थी। कांग्रेस ने इस बार किशनगंज से भाजपा की ललित मीणा के सामने निर्मला सहरिया को उतारा है। जिले की अन्य तीन सीटों- बारां अटरू, अंटा और छबड़ा पर भाजपा का कब्जा है।