क्या जाटों का भरोसा जीत पाएंगी वसुंधरा?
पिछले चुनाव में जाटों ने, जो करीब 40 से 50 विधानसभा सीटों पर जीत हार का फैसला करते हैं, कांग्रेस के खिलाफ भाजपा के पक्ष में मतदान किया था। लेकिन इस बार जाटों में ज्यादातर का रुख कांग्रेस के हक में दिखा। वजह वसुंधरा सरकार के कार्यकाल में उनकी उपेक्षा और किसानों की बदहाली। क्योंकि जाटों का मुख्य पेशा खेती किसानी ही है। इसलिए बिजली की कटौती, खाद, बीज और डीजल की महंगाई, फसल का उचित मूल्य न मिलना जैसे किसानों के मुद्दों से जाट बुरी तरह प्रभावित हैं और उनकी नाराजगी साफ नजर आती है।
राजपूतों की नाराजगी पड़ेगी भारी?
यही हाल दूसरे खेतिहर समुदायों का भी है। गूजर इसलिए कांग्रेस के साथ एकजुट हैं कि उन्हें लगता है कि अगर कांग्रेस सरकार बनी तो सचिन पायलट मुख्यमंत्री बन सकते हैं। भाजपा का मुख्य जनाधार रहे राजपूतों के भीतर आनंद पाल सिंह की पुलिस मुठभेड़ में हत्या और जसवंत सिंह और उनके बेटे मानवेंद्र सिंह की लगातार भाजपा में उपेक्षा की गहरी टीस है। भाजपा के पास अब भैरों सिंह शेखावत जैसा कोई कद्दावर नेता भी नहीं है जो अपनी राजपूत बिरादरी के साथ साथ दूसरी जातियों को भी पार्टी के साथ एकजुट रख सके। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे निश्चति रूप से दबदबे वाली नेता हैं, लेकिन उनकी स्वीकार्यता सबके बीच शेखावत जैसी नहीं है।
क्या मीणा को साध पाएगी कांग्रेस?
मीणा जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का जनाधार रहे हैं, गूजर आरक्षण आंदोलन की वजह से पिछली बार कांग्रेस के खिलाफ हो गए थे, इस बार उनका रुझान भी बदला दिख रहा है। लोकसभा से इस्तीफा देकर कांग्रेस में शामिल हुए भाजपा सांसद हरीश मीणा को विधानसभा चुनाव में उतार कर कांग्रेस ने मीणा मतदाताओं को साधने की कोशिश भी की है। मुसलमान जो आम तौर पर विभाजित होकर वोट देते थे, इस बार योगी आदित्यनाथ के चुनावी दौरों और उनके हिंदुत्ववादी भाषणों की प्रतिक्रिया में कांग्रेस के साथ गोलबंद होते दिखे।
नोटबंदी से नाराज व्यापारी वर्ग का रुख साफ नहीं
नोटबंदी और जीएसटी से कारोबार को हुए नुकसान का असर व्यापारियों पर साफ दिखता है, लेकिन भाजपा का यह परंपरागत वोट बैंक क्या करवट लेता है, यह साफ नहीं है। भाजपा के दिग्गज ब्राह्णण नेता रहे घनश्याम तिवाड़ी की अनदेखी और बगावत ने पार्टी के ब्राह्रण जनाधार को भी दुखी किया है, लेकिन मोटे तौर पर अभी भी ब्राह्णण भाजपा के पक्ष में दिख रहे हैं। आदिवासियों, अनुसूचित जातियों का झुकाव कांग्रेस की तरफ दिखा, जबकि पिछड़ी जातियों में भाजपा का असर बरकरार है।