राइट टू हेल्थ बिल को लेकर राजस्थान सरकार और निजी डॉक्टर्स संघर्ष समिति के बीच विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा है। 11 दिन से समित और सरकार के बीच गतिरोध चल रहा है। सरकार मामला शांत कराने की कोशिश कर रही है, लेकिन मंगलवार को चिकित्सा मंत्री प्रसादी लाल मीणा के बयान ने आग में घी डालने का काम किया।
राइट टू हेल्थ बिल को लेकर मंत्री मीणा ने कहा- किसी भी अस्पताल का पेमेंट बाकी नहीं, हमने 15 दिन में सभी अस्पतालों के पेमेंट दिए हैं। डॉक्टर्स सरकार पर एहसान नहीं कर रहे, काम के बदले ने पैसे दिए जा रहे हैं, काम करेंगे तो पैसा दिया जाएगा। राइट टू हेल्थ बिल लागू होने के बाद उसे मानना होगा, नहीं तो करवाई की जाएगी। सरकार के दरवाजे वार्ता के लिए हमेशा खुले हैं। कानून को वापस लिया जाए ये कहने का अधिकार डॉक्टरों के पास नहीं है।
मंत्री मीणा ने कहा- ये कानून जनता के हित में है। अगर, डॉक्टरों के कोई सुझाव है तो सरकार उसे मानने के लिए तैयार है, लेकिन ये बिल किसी भी कीमत पर सरकार वापस नहीं लेगी।
मंत्री मीणा के बयान के बाद डॉक्टर्स संघर्ष समिति ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाई। जिसमें डॉक्टर्स ने कहा- मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने बिल पढ़ा है या फिर बजट की तरह ही ब्यूरोक्रेसी पर छोड़ दिया है, जिसके चलते आज प्रदेश की यह स्थिति हुई है।
डॉक्टर्स संघर्ष समिति ने कहा कि चिकित्सक समाज राजस्थान के प्रत्येक नागरिक को गुणवत्ता युक्त इलाज उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। आप स्वास्थ्य के अधिकार बिल के द्वारा अपनी मंशा तो जाहिर कर सकते हो लेकिन जब जमीन पर आएगा तो गुणवत्तापूर्ण इलाज बढ़ेगा या घटेगा इसका अनुमान चिकित्सक समाज के अलावा कोई भी नेता, मंत्री या सरकारी अधिकारी नहीं लगा सकता। हम आपकी मंशा से ज्यादा प्रदेशवासियों के हित के लिए प्रतिबद्ध है। संपूर्ण राजस्थान का संगठित चिकित्सक समाज आज असहयोग आंदोलन पर बैठा है। यह साफ प्रदर्शित करता है कि चिकित्सक समाज इस बिल से बिल्कुल भी सहमत नहीं है।
समिति ने कहा- दुर्घटना की स्थिति में गोल्डन आवर के महत्व को देखते हुए निशुल्क परिवहन, चिरंजीवी योजना, दुर्घटना बीमा और विभिन्न सरकारी संस्थान पहले से ही कार्यरत हैं। अगर, सरकार को लगता है कि इन सबके बावजूद आम जनता दुर्घटना की स्थिति में प्राप्त वर्तमान इलाज से असंतुष्ट है तो सरकार को चाहिए कि वह इन सभी योजनाओ में सुधार करे ना कि असंवैधानिक और दमनकारी स्वास्थ्य के अधिकार बिल के द्वारा राजस्थान की जनता की स्वास्थ्य सेवाओं का गला घोंटे।
जहां तक चिकित्सक समाज के वित्तीय हितों का सवाल है तो अभी तक लगभग 55 करोड रुपए जो कि चिकित्सक समाज ने मेहनत करके और जनता की सेवा करके भामाशाह योजना में कमाया था वह अभी तक उन्हें नहीं मिल पाया है। इसे देखते हुए ऑटो अप्रूवल (Auto Aprroval) का प्रावधान वर्तमान की चिरंजीवी योजना और आरजीएचएस योजना में लागू करना चाहिए।
चिकित्सक समाज सरकार की इस मंशा से गदगद है कि प्रदेशवासी चिकित्साकर्मियों का सम्मान बनाए रखें। लेकिन, अगर सरकार खुद ही चिकित्सक समाज के हित को ध्यान में नहीं रखेंगे और उन्हें समाज में सम्मानजनक स्थिति प्रदान नहीं करेंगे तो प्रदेशवासी कैसे इस दायित्व को पूरा करेंगे। डॉक्टर्स समिति ने कहा- बिल वापसी से ही हमारी हड़ताल खत्म हो सकती है। इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं है।