उस्ताद अहमद हुसैन और मोहम्मद हुसैन को पद्मश्री से नवाजा गया है।
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गजल और कव्वाली गायकी के मशहूर हुसैन बंधु उस्ताद अहमद हुसैन और उस्ताद मोहम्मद हुसैन को पद्मश्री से नवाजा गया है। हुसैन बंधु राजस्थान के जयपुर से हैं और खुदको उस्ताद नहीं विद्यार्थी मानते हैं। जब इन दोनों ने संगीत सीखने का मन बनाया, तो इनके पिता ने मां से कहा था कि दोनों बच्चों को मेरे पास बेटों के तौर पर नहीं शिष्य के तौर पर ही भेजना, तभी असली गायकी का बारीक ज्ञान हासिल कर पाएंगे। पिता ने सीख दी कि बेटा तुम दोनों हमेशा साथ रहना, उन्होंने ही हमारी जोड़ी बनाई, इसलिए इनका रिश्ता कमजोर नहीं एक खून, एक खयालात और एक सुर का रिश्ता है। 'उस्ताद अहमद हुसैन' और 'मुहम्मद हुसैन' क्लासिकी, गज़ल गायकी, भजन और कव्वाली गाया करते हैं। इनके पिता 'उस्ताद अफज़ल हुसैन' भी ग़ज़ल और ठुमरी के उस्ताद रहे थे।
1958 में गायकी का सफर शुरू किया
हुसैन बंधुओं ने अपनी गायकी की सफ़र 1958 में शुरू किया था। इसके बाद 1959 में चाइल्ड आर्टिस्ट के रूप में आकाशवाणी, जयपुर से सफर शुरू किया। क्लासिकी ठुमरी फनकारों के तौर पर पहला एलबम 'गुलदस्ता' 1980 में रिलीज़ हुआ। जो बेहद कामयाब रहा। इसके बाद अपनी आवाज और संगीत को जनता तक ले जाने के लिए 50 से ज्यादा एलबम बनाए। फिर एलबम 'मान भी जा' में टैंपॉ संगीत के जरिए कला बिखेरी। साल 1978 में 'मैं हवा हूं कहां वतन मेरा' की गजल गायकी से इन्हें काफी नाम मिला। उसके बाद से फिल्मों में भी वीरजारा सहित कई फिल्मों में मौका मिला। पॉपुलर गजल 'चल मेरे साथी चल', 'नज़र मुझसे' भी काफी चर्चाओं में रहीं।
साल 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
हुसैन बंधुओं को साल 2000 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया। एक बार जब हुसैन बंधु जयपुर में परफॉर्म कर रहे थे, तब सितारा देवी भी आई हुई थीं। उन्होंने अपने साथ माया नगरी मुम्बई चलने को कहा, वहां काम तो काफी मिल रहा था, लेकिन पैसा ज्यादा नहीं था। इस कारण हुसैन बंधुओं ने जयपुर में ही ज्यादातर वक्त काम किया। बीच-बीच में मुम्बई भी जाते रहे। इस दौरान सितारा देवी ने इन्हें कल्याणजी-आनंदजी से मिलवाया। 1970 में एलबम ‘गुलदस्ता’ रिलीज हुआ, जिसका गाना 'मैं हवा हूं कहां वतन मेरा' बहुत पसंद किया गया। यह एलबम इतना लोकप्रिय हुआ कि दोनों भाईयों ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा।