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पढ़िए, राजस्थानी बिटिया की अनोखी कहानी

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पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहने वाली मंजू को यह नहीं पता था कि जीवन में ऐसी विकट परिस्थितियां आ जाएंगी कि उसे अपनी पढ़ाई से हाथ धोना पड़ेगा। जीवन में कुछ कर गुजरने का सपना देखने वाली मंजू का ये ख्वाब उसके भाई के गंभीर अपराध में जेल जाने के बाद बिखर गया लेकिन अदालत की पहल ने उसके सपनों को फिर से नए पंख दे दिए।
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यह मामला है जोधपुर का। 21 वर्षीय मंजू सीरवी ने अपने भाई की पैरोल के लिए हाईकोर्ट से गुहार लगाई। उसने अपनी पढ़ाई का हवाला देते हुए जज साहब से अपने भाई को पैरोल पर रिहा करने की मांग की।

मंजू ने कोर्ट को बताया कि उसके माता-पिता बुजुर्ग हैं और मजदूरी करते हैं, वह उसकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते। मेरा भाई ही मेरी पढ़ाई का खर्च उठा रहा था लेकिन उसके जेल जाने के बाद मेरी पढ़ाई छूट गई है।
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उसने कहा कि वह जीवन में कुछ बनना चाहती है, कुछ करना चाहती है, इसलिए उसके भाई को रिहा कर दिया जाए।
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कोर्ट की पहल पर वकील ने उठाया पढ़ाई का खर्च

मंजू की बात जोधपुर हाईकोर्ट के न्यायाधीश गोविंद माथुर ने बड़े गौर से सुनी और एक अन्य मामले की सुनवाई का इंतजार कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता मघराज सिंघवी की ओर देखते हुए कहा, ‘वकील साहब आप इस मामले में क्या कर सकते हैं।’

वकील ने कहा कि पैरोल का फैसला तो अदालत को करना है लेकिन इस बच्ची की पढ़ाई का खर्च मैं उठाने को तैयार हूं। अपने दो बच्चों की तरह मैं इसका भी ख्याल रखूंगा और यह जब तक पढ़ना चाहेगी, इसकी पढ़ाई की जिम्मेदारी मेरी होगी।

उन्होंने पाली जिले के बाली स्थित मरुधर महिला शिक्षण संघ कॉलेज से संपर्क किया और फीस आदि की जानकारी मालूम की। एडवोकेट सिंघवी ने फौरन 30 हजार रुपए का चेक काटकर मंजू को सौंप दिया।

उन्होंने कहा, 'मुझे अपने जन्मदिन के दिन एक और बेटी को पढ़ाने का मौका मिला है, मैं इसके लिए ईश्वर का धन्यवाद करता हूं। यह मेरा सौभाग्य है। अपने बेटे क्षितिज, बेटी श्वेता की तरह मंजू को भी उच्च शिक्षा दिलाने में कोई कमी नहीं रखूंगा।'
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