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Jaisalmer: गोंडावण के चूजों को मिले सिंदूर, एटम, मिश्री, व्योम और सोफिया के नाम, सेना और संरक्षण का अनोखा संगम

Sat, 07 Jun 2025 09:03 PM IST
प्रिया वर्मा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जैसलमेर

सार

गोंडावणों की घटती संख्या देखते हुए इसके संरक्षण के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा  चलाए जा रहे गोंडावण संरक्षण प्रोजेक्ट के तहत हाल के दिनों में जन्मे गोंडावण के चूजों को दिए गए अनोखे नाम चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। 
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राजस्थान - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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जैसलमेर के रेगिस्तानी इलाके में चल रहे गोंडावण संरक्षण प्रोजेक्ट से जुड़ी एक अनोखी पहल सामने आई है। हाल ही में यहां जन्मे गोंडावण के चूजों को भारतीय सेना के ऑपरेशन सिंदूर और उससे जुड़े जांबाज अफसरों का नाम दिया गया है।

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सुदासरी और सम ब्रीडिंग सेंटर में इन चूजों को सिंदूर, एटम, मिश्री, व्योम और सोफिया जैसे नाम दिए गए हैं। यह नाम न केवल इन बच्चों की पहचान बनेंगे, बल्कि देश के सुरक्षा बलों के साहस और बलिदान की याद भी दिलाएंगे। वन विभाग से मिली जानकारी के अनुसार इस साल अब तक 21 चूजे हैच हो चुके हैं, जिनमें सात मई महीने में और एक 1 जून को जन्मा है।

5 मई को जन्मे चूजे को 'सिंदूर' नाम दिया गया है। यह नाम सीधे उस सैन्य कार्रवाई से जुड़ा है। 'एटम', 9 मई को जन्मा, जो ऑपरेशन की रणनीतिक क्षमता का प्रतीक है। 'मिश्री' नाम 19 मई को जन्मे चूजे को मिला, यह नाम एक गुप्त साइबर अफसर को समर्पित है। 'व्योम' और 'सोफिया', ये नाम विंग कमांडर व्योमिका सिंह और कर्नल सोफिया कुरैशी के नाम पर रखे गए हैं, जो ऑपरेशन की आधिकारिक ब्रीफिंग में शामिल थीं।
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गोंडावण प्रजाति भारत की सबसे संकटग्रस्त पक्षियों में से एक है, जिसकी संख्या अब 150 से भी कम रह गई है। पहले यह पूरे देश के घास के मैदानों में देखा जाता था लेकिन अब राजस्थान ही इसका अंतिम ठिकाना बन गया है।

2018 में शुरू हुआ प्रोजेक्ट ग्रेट इंडियन बस्टर्ड केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से चल रहा है। इसके तहत एआई से लैस निगरानी, तापमान नियंत्रित इनक्यूबेटर और अन्य अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है, जिससे अब तक 65 से अधिक चूजे सफलतापूर्वक पाले जा चुके हैं।

वन विभाग के अधिकारी बताते हैं कि इन चूजों को अब धीरे-धीरे ऐसे वातावरण में रखा जा रहा है, जहां वे प्राकृतिक परिस्थितियों के अनुरूप ढल सकें। इसका उद्देश्य है कि भविष्य में इन्हें जंगल में छोड़ा जा सके, ताकि यह प्रजाति फिर से अपने प्राकृतिक आवास में लौट सके।
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प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारी यह भी मानते हैं कि इस अभियान में स्थानीय समुदायों की भागीदारी बेहद जरूरी है। उनका कहना है कि यह सिर्फ एक पक्षी को बचाने का नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा का मामला है। गोंडावण को नया जीवन देने की इस कोशिश को ऑपरेशन सिंदूर के साथ जोड़ना वन विभाग की ओर से एक भावनात्मक और प्रेरणादायक कदम माना जा रहा है।

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