सरकार भले ही तीन साल से अधिक समय तक एक ही जगह पर काम करने वाले अफसरों और कर्मचारियों को बदलने संबंधी आदेश जारी करे लेकिन हकीकत इससे परे है। सरकार को मार्गदर्शन देने वाले महकमों में ही ब्यूरोक्रेट्स के कई खास अफसर दशकों से गद्दी जमाए बैठे हैं। इतना ही नहीं रिटायर होने के बाद इन्हें पे माइनस पेंशन और उसके बाद कान्ट्रेक्ट पर सलाहकार के तौर पर नियुक्ति मिलती रही है।
अकेले वित्त विभाग में ही ऐसे 27 रिटायर्ड कर्मचारी हैं, जो पे माइनस पेंशन या सलाहकार के तौर पर काम कर रहे हैं। लगभग यही स्थिति सरकार को कर्मचारियों के सेवा नियमों की सलाह देने वाले कार्मिक विभाग की भी है।
गृह एवं वित्त में सबसे ज्यादा डेपुटेशन
सचिवालय में संविदा और डेपुटेशन पर करीब 450 कार्मिक काम कर रहे हैं। इनके अलावा करीब 50 से ज्यादा कार्मिक संविदा पर काम कर रहे हैं। डेपुटेशन और संविदा पर काम करने वाले इन कर्मचारियों में सबसे ज्यादा वित्त, गृह, खान, श्रम एवं रोजगार विभाग में लगाए गए हैं। यही नहीं सचिवालय में बाहर के महकमों से भी गोपनीय एवं महत्वपूर्ण विभागों के काम देखने के लिए डेपुटेशन पर लोग लगाए गए हैं। इसमें सबसे ज्यादा संख्या वित्त एवं गृह विभाग में है। गृह विभाग में पुलिस कर्मिकों को लगा रखा है और वित्त विभाग में ऐसे अकाउंटेंट डेपुटेशन पर लगाए गए हैं, जिनकी नियुक्ति सरकारी कंपनियों में है।
तीन साल वाले नियम का तोड़
जो चहेते अफसर रिटायर नहीं हुए उन्हें एक ही सीट पर लगातार प्रमोशन दे दिए जाते हैं ताकि उनका पद बदल जाए। ऐसा इसलिए किया जाता है कि 3 साल से अधिक एक ही सीट पर नहीं बने रहने के आदेशों के दायरे से वे बाहर रहें। इतना ही नहीं यदि उनकी सीट बदली जाती है तो पहले वाली सीट एडिशनल चार्ज के तौर पर उन्हें ही थमा दी जाती है। दरअसल सरकार में एडिशनल चार्ज एक तात्कालिक व्यवस्था होती है लेकिन वित्त विभाग में इसके नाम पर सालों से चांदी कूटी जाती रही है।
राज. सचिवालय सेवा अधिकारी संघ के डॉ. के.के. स्वामी बताते हैं कि सचिवालय में करीब 90 रिटायर लोगों को लगा रखा है। इनकी निष्ठा सरकार के प्रति नहीं बल्कि उन अफसरों के प्रति होती है, जिन्होंने इन्हें लगाया है। इनका कोई आउटपुट भी नहीं है। सचिवालय में अफसरों के बैठने की व्यवस्था नहीं लेकिन रिटायर लोगों को चैंबर और स्टाफ देना पड़ता है।
चिंता है क्योंकि :
प्राइवेट, सेवानिवृत्त, रिवर्स डेपुटेशन कर्मचारी सरकारी कामकाज को प्रभावित करते हैं। जांच में इस संबंध में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए :
सामान्यत: सरकारी सेवा में कार्यरत कार्मिक तत्संबंधी नियमों एवं प्रावधानों को ध्यान में रखकर ही फाइलों को आगे बढ़ाता है क्योंकि उन्हें डर रहता है कि नियम विरुद्ध काम करने पर भविष्य में उन पर सेवा नियमों के तहत कार्रवाई हो सकती है। इससे गलत काम करने की प्रवृत्ति पर काफी हद तक रोक लगती है।
लेकिन सेवानिवृत्त एवं प्राइवेट व्यक्तियों से सरकार में नियम विरुद्ध कार्य या किसी व्यक्ति अथवा संस्था को फायदा पहुंचाने वाला कार्य आसानी से करवाया जा सकता है क्योंकि एक तो सेवा नियमों के तहत इन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती। दूसरा राजकोष को नुकसान की ऐवज में इनसे किसी तरह की वसूली नहीं की जा सकती। साथ ही साथ इनकी पदोन्नति रोककर इन्हें दंडित भी नहीं किया जा सकता और इनकी निष्ठा राज्य के प्रति ना होकर इन्हें वहां नियुक्त करने वाले के प्रति होती है।
इसके अलावा अन्य बोर्ड, कॉरपोरेशन्स, कंपनीज के लोगों को सरकार के प्रमुख विभागों में डेपुटेशन पर लगाया जाता है। यह कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट की श्रेणी में आता है। ऐसे व्यक्ति सरकार की जगह उस बोर्ड, कॉरपोरेशन या कंपनी का पक्ष लेते हैं, जहां इनकी नियुक्ति होती है। सरकार के ज्यादातर महकमों में जो ट्रेप की कार्रवाई होती है, उनमें ऐसे ही लोग सबसे ज्यादा पकड़ में आते हैं।
इस तरह की नियुक्तियों से राज्य के खजाने पर अनावश्यक भार भी आता है। इसके साथ ही जिन पदों के खाली रहने पर नई वेकेंसी निकाली जानी चाहिए उन्हें संविदा या डेपुटेशन के माध्यम से अनावश्यक रूप से भरा जाना बेरोजगारों के साथ धोखा है।
सचिवालय कर्मचारी संघ के अध्यक्ष सीताराम जाट का कहना है कि सचिवालय की कार्यप्रणाली ऐसी है कि यहां गोपनीयता का काम होता है। ऐसे में यहां प्रतिनियुक्ति और आफ्टर रिटायरमेंट वाले लोगों को नहीं लगाया जाना चाहिए। इसके लिए हमने सरकार को ज्ञापन दिए हैं।