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Rajasthan: जासूसी मामले में आरोपी झाबरा राम को मिली जमानत, गिरफ्तारी प्रक्रिया में कानूनी चूक पर सख्त टिप्पणी

Tue, 26 May 2026 12:43 PM IST
जयपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

पाकिस्तान के लिए कथित जासूसी के आरोप में गिरफ्तार झाबरा राम को राजस्थान हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है। कोर्ट ने साफ कहा कि आरोपी को राहत आरोपों की कमजोरी नहीं, बल्कि गिरफ्तारी प्रक्रिया में पुलिस और अभियोजन पक्ष की गंभीर कानूनी चूक के कारण दी गई है।
 
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पाक जासूसी मामले में गिरफ्तार झाबरा राम को जमानत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पाकिस्तान के लिए कथित जासूसी के आरोप में गिरफ्तार झाबरा राम को राजस्थान हाईकोर्ट से जमानत मिल गई है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी को राहत आरोपों की कमजोरी के कारण नहीं, बल्कि गिरफ्तारी प्रक्रिया में पुलिस और अभियोजन पक्ष की गंभीर कानूनी चूक के चलते दी गई है। हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी, लोक अभियोजक और रिमांड मंजूर करने वाले मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणी की है।

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राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच के जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकल पीठ ने कहा कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित रूप में ग्राउंड ऑफ अरेस्ट उपलब्ध नहीं कराना संविधान और कानून का सीधा उल्लंघन है। अदालत ने माना कि ऐसी स्थिति में गिरफ्तारी की वैधता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं।

मामला सीआईडी सिक्योरिटी थाना, जयपुर में दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। इसके तहत पोकरण के सांकड़ा निवासी झाबरा राम (28) को 30 जनवरी को राजस्थान इंटेलिजेंस ने जैसलमेर से गिरफ्तार किया था। जांच एजेंसी का आरोप है कि वह पिछले करीब डेढ़ साल से भारतीय सेना और सैन्य प्रतिष्ठानों से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई तक पहुंचा रहा था। एजेंसी के अनुसार आरोपी को हर सूचना या टास्क के बदले 5 से 10 हजार रुपए तक दिए जाते थे। जांच एजेंसियों के मुताबिक आरोपी के मोबाइल फोन से आईएसआई हैंडलर्स के साथ चैट, डिजिटल डेटा और अन्य इलेक्ट्रॉनिक सबूत मिले थे। आरोपी के खिलाफ ऑफिशियल सीक्रेट एक्ट 1923 की धारा 3 और 9 के अलावा भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 और 238(b) के तहत मामला दर्ज किया गया था।
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आरोपी की ओर से दायर जमानत याचिका में अधिवक्ता आर.बी. शर्मा गंथोला ने दलील दी कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया संविधान और भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों के विपरीत अपनाई गई। बचाव पक्ष का कहना था कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार नहीं बताए गए, जबकि यह उसका संवैधानिक और वैधानिक अधिकार है। बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि गंभीर अपराधों में भी जांच एजेंसियों के लिए संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना जरूरी है। अदालत ने इन दलीलों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि रिकॉर्ड में कहीं यह साबित नहीं होता कि आरोपी को लिखित ग्राउंड ऑफ अरेस्ट दिए गए थे।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जांच एजेंसी ने उचित सावधानी बरती होती तो गिरफ्तारी की वैधता पर सवाल नहीं उठते। अदालत ने स्पष्ट कहा कि ऐसी स्थिति में आरोपी को जमानत देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। हालांकि कोर्ट ने राज्य सरकार को कानून के तहत दोबारा गिरफ्तारी की कार्रवाई करने की स्वतंत्रता भी दी है। फैसले में अदालत ने केवल पुलिस ही नहीं, बल्कि लोक अभियोजक और रिमांड मंजूर करने वाले मजिस्ट्रेट को भी जिम्मेदार ठहराया। कोर्ट ने कहा कि रिमांड सुनवाई के दौरान मजिस्ट्रेट और अभियोजन पक्ष का दायित्व था कि वे सुनिश्चित करें कि आरोपी को लिखित ग्राउंड ऑफ अरेस्ट उपलब्ध कराए गए हैं।
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हाईकोर्ट ने आदेश की प्रति डीजीपी राजस्थान, निदेशक अभियोजन और राज्य की सभी अधीनस्थ अदालतों को भेजने के निर्देश दिए हैं। साथ ही संबंधित जांच अधिकारी और लोक अभियोजक के खिलाफ कार्रवाई पर विचार करने को कहा गया है। अदालत ने संबंधित ACJM की भूमिका को भी गंभीर मानते हुए मामला मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने के निर्देश दिए। अदालत ने आरोपी को 50 हजार रुपए के निजी मुचलके और 25-25 हजार रुपए की दो जमानतों पर रिहा करने का आदेश दिया है। साथ ही हर महीने की 25 तारीख को पुलिस थाने में हाजिरी लगाने, पासपोर्ट जमा कराने और बिना अनुमति देश नहीं छोड़ने जैसी शर्तें लगाई हैं।

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