राजस्थान में 1200 करोड़ की अन्नपूर्णा योजना में सरकार फूड पैकेज वितरित करने के लिए सहकारिता के माध्यम से प्राइवेट सप्लार्य तय किए। इनमें अलग-अलग जिलों में फूड पैकेट सप्लाई करने के लिए अरुणाचल इंपेक्स प्राइवेट लिमिटेड, केंद्रीय भंडार, कॉनफेड, एमवी एग्रोटेक प्राइवेट लिमिटेड, एसएस फूड इंडस्ट्रीज और गोकुल इंडस्ट्रीज को सप्लाई के टेंडर दिए गए।
वित्त विभाग के अफसर दावा कर रहे हैं कि छोटी राशि के बिलों को पहले क्लीयर किया जाता है। वहीं, बड़ी राशि के बिलों को उसके बाद क्लीयर किया जाता है। लेकिन इस दावे के उलट योजना में चहेते प्राइवेट सप्लायर्स को लाइन तोड़ कर भुगतान किए गए। इसमें न तो अमाउंट का ध्यान रखा गया और न ही बिल सब्मिट होने की तारीख का। कई बिल ऐसे हैं, जो बड़े अमाउंट के हैं और छोटे बिलों के काफी बाद ईसीएस के लिए वित्त विभाग के पास पहुंचे। लेकिन उन्हें प्राथमिकता से भुगतान किया गया।
400 करोड़ के भुगतान पेंडिंग
योजना में 300 करोड़ रुपये के भुगतान हो चुके हैं। 400 करोड़ के बिल ईसीएस के लिए पेंडिंग पड़े हैं और कई बड़े बिल अभी ट्रेजरी में आना बाकी हैं, जो इस नई सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकते हैं।
इन बिलों में छोटी राशि वाले बिल (बिल नं. 48685223) जो पहले सब्मिट हुए उनका भुगतान 2 महीनों से अटका हुआ है। जबकि इसके बाद सब्मिट हुए इससे बड़ी राशि के बिल (बिल नं. 48907744) का महज 13 दिन में ही भुगतान कर दिया गया। ऐसे दर्जनों बिल हैं, जो पांच से सात दिनों में कर दिए गए और कइयों का भुगतान दो-दो महीने से नहीं हुआ। ऐसे ही खेल तमाम सरकारी योजनाओं में किया गया, जिसकी जांच की जानी जरूरी है।
100 प्रतिशत ट्रांसपेरेंट है। छोटा अमाउंट पहले कर देते हैं। बड़े भुगतान के लिए कुछ वक्त लग जाता है। हमारे यहां ट्रांसपेंरेंसी नहीं है तो संसार में कहीं भी नहीं है।
बृजेश कुमार शर्मा, डायरेक्टर बजट