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Rajasthan Budget: जिसके हाथ लगा उसी ने उड़ा दिया बजट, पूल सिस्टम ने राजस्थान को लगाई चार हजार करोड़ की चपत

Wed, 07 Feb 2024 07:28 PM IST
अरविंद कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

पूल बजट को लेकर इन दिनों सरकारी महकमों में हाहाकार मचा हुआ है।  राजस्थान को वित्तीय रूप से करीब चार हजार करोड़ रुपये की चपत लगी है। साथ में विभागों के काम अटकने से सरकारी योजनाओं पर भी सीधा असर पड़ा।
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पूल सिस्टम ने राजस्थान को लगाई चार हजार करोड़ की चपत - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पूर्व सीएम वसुंधरा राजे के बाद अब दीया कुमारी महिला वित्त मंत्री के तौर पर गुरुवार को अपना और अपनी सरकार का पहला बजट पेश करेंगी। इसमें सबसे बड़ी चुनौती राजस्थान के बजटरी लीकेज रोकने की होगी। अफसरों के प्रयोगों ने राजस्थान को आर्थिक आपातकाल की ओर धकेल दिया। इसमें अकेले पूल बजट सिस्टम के चलते सरकार को एक वित्तीय वर्ष में चार हजार करोड़ रुपये की चपत लग चुकी है।

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राजस्थान फिर से आर्थिक स्थिरता की तरफ कब लौटेगा यह बड़ा सवाल है। गुरुवार को वित्त मंत्री दीया कुमारी विधानसभा में वोट ऑन अकाउंट पेश करने जा रही हैं। इसमें राजस्व बढ़ाने के संसाधन तलाशने के साथ रेवेन्यू लीकेज रोकना भी चुनौती होगी। पूल बजट को लेकर इन दिनों सरकारी महकमों में हाहाकार मचा हुआ है। इसके चलते राजस्थान को वित्तीय रूप से करीब चार हजार करोड़ रुपये की चपत लगी ही। साथ में विभागों के काम अटकने से सरकारी योजनाओं पर भी सीधा असर आया।

हाल में निदेशक जन स्वास्थ्य डॉ. रवि प्रकाश माथुर को अपने अधीनस्थ कार्यालयों को निर्देश जारी करने पड़े कि कोई भी न्यू आइटम सक्षम स्तर पर स्वीकृति के बाद ही खरीदें। आदेशों की पालना नहीं करने पर कार्रवाई होगी। अब वह वजह भी जानिए कि यह आदेश क्यों निकालना पड़ा।
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दरअसल, वित्त विभाग ने कुछ समय पहले अपने यहां पूल बजट सिस्टम लागू कर दिया। इसमें विभाग को एक मुश्त बजट जारी कर दिया जाता है। इसके बाद विभाग के अधीन आने वाले कार्यालय अपने हिसाब से इसमें से राशि आहरित कर खर्च कर लेते हैं। इसके लिए सक्षम स्तर पर स्वीकृति की आवश्यकता नहीं होती। इसका दुष्प्रभाव यह रहा कि ज्यादातर विभागों का बजट छह महीने में ही रीत गया और आगे का काम चलाने के लिए एडिश्नल बजट लेना पड़ा, जिससे राज्य को चार हजार करोड़ की एडिश्नलीटी करनी पड़ी।

राजस्व विभाग में कई कर्मचारियों को नोटिस
राजस्व विभाग में पूल बजट सिस्टम के चलते ट्रैवलिंग एक्सपेंस पहले छह महीने में ही खत्म हो गया। इसके चलते कई कर्मचारियों को पिछली सरकार में ही नोटिस मिल गए। इसी तरह जल संसाधन विभाग, स्वास्थ्य विभाग में भी ट्रैवलिंग एक्सपेंस के बिल बजट खत्म होने के चलते पास नहीं हो पा रहे थे।

पहले 30:60:90 के अनुपात में जारी होता था बजट
सरकार हर बजट में विभागवार पैसा आवंटित करती थी। हर विभाग में बजट कंट्रोलिंग ऑफिसर होता है। विभाग के ऑफिसों में डीडीओ होते हैं। विभाग को आवंटित बजट हर डीडीओ को जरूरत के हिसाब से बांट दिया जाता था। इसमें पहली तिमाही में कुल बजट का 30 प्रतिशत, दूसरी में 60 प्रतिशत और तीसरी में 90 प्रतिशत तक बजट खर्च किए जाने का प्रावधान होता था।

जानिए कैसे नुकसान पहुंचया पूल बजट ने
पूर्व व्यवस्था में बजट सत्र में विभाग की मांग पर सदस्यों द्वारा मतदान के बाद जितनी राशि की मांग स्वीकृत होती है, उतनी राशि का बजट उस विभाग को आवंटित कर दिया जाता है। इसके बाद विभाग अपने स्तर पर अपने अधीनस्थ कार्यालयों में यह बजट प्रायोरिटी के आधार पर आवंटित कर दिया जाता है। कोई भी कार्यालय उसे आवंटित बजट से ज्यादा राशि खर्च नहीं कर सकता। यदि इस व्यवस्था में कार्यालय को अतिरिक्त धन की आवश्यकता है तो विभाग से आवेदन किया जाता है। विभाग में परीक्षण के उपरांत उचित प्रतीत होने पर उसे राशि देने का निर्णय होता है।

पूल बजट: विधानसभा से बजट पास होने के बाद विभाग को आवंटित राशि उसके अधीनस्थ सभी कार्यालयों को खर्च करने के लिए अनुमत कर दी जाती है।

नुकसान: एक ही कार्यालय विभाग को आवंटित संपूर्ण बजट भी खर्च कर दे तो उस पर नियंत्रण का कोई सिस्टम नहीं है। 

एक कार्यालय का बजट दूसरा कार्यालय खर्च कर देता है। इसका असर यह हुआ कि विभागों को जो राशि पूरे वित्तीय वर्ष में खर्च करने के लिए मिली, वह छह महीने में ही खर्च हो गई। शेष वित्तीय वर्ष में ऑफिस चलाने के लिए या तो अतिरिक्त प्रावधान करना पड़ा, जिससे राज्य पर अनावश्यक भार आया। यदि अनुमति नहीं मिली तो ऑफिस के सारे काम अटक गए।

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