राजधानी जयपुर से करीब 100 किमी दूर सरिस्का टाइगर सेंचुरी में स्थित पांडुपोल हनुमान मंदिर का पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि महाभारत काल में भीम और हनुमानजी की भेंट यहीं पर हुई थी। इसी जगह पर हनुमान जी ने भीम का अभिमान तोड़ा था और उन्हें युद्ध में विजयश्री का आशीर्वाद दिया था।
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बताया जाता है कि महाभारत काल में अज्ञातवास के दौरान जब भीम यहां से गुजर रहे थे। इस दौरान उन्हें रास्ते में एक बूढ़ा वानर नजर आया, जिसकी लंबी पूंछ मार्ग में फैली हुई थी। भीम ने वानर को अपनी पूंछ हटाने के लिए कहा। इस पर वानर ने कहा कि मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूं आप ही इसे उठाकर एक तरफ रख दो। भीम ने बहुत कोशिश की लेकिन वह पूंछ हिला नहीं पाए। इस पर भीम ने वानर को वास्तविक स्वरूप में दर्शन देने की प्रार्थना की। भीम की प्रार्थना पर हनुमानजी अपने वास्तवित रूप में आए और पांडवों को महाभारत युद्ध में विजयश्री का आशीर्वाद दिया। साथ ही यह वचन भी दिया कि वे युद्ध में ध्वजा रूप में पांडवों के रथ पर विराजमान रहेंगे।
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इसी स्थान को अब पांडुपोल में हनुमान मंदिर के रूप में जाना जाता है। यहां हनुमानजी की लेटी हुई प्रतिमा है। हनुमान मंदिर से कुछ दूरी पर ही बड़ा पोल है, जिसके बारे में प्रचलित है कि भीम ने अपनी गदा से यहां बड़ी चट्टान को तोड़कर इस मार्ग को बनाया था।