पेपरलीक और मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में जेल में बंद राजस्थान लोक सेवा आयोग के निलंबित सदस्य बाबूलाल कटारा अपने बेटे की शादी में शामिल नहीं हो सकेंगे। विभिन्न अदालतों ने उनके खिलाफ दर्ज मामलों में अंतरिम जमानत याचिकाएं खारिज कर दी हैं। हालांकि तीन मामलों में कोर्ट ने पुलिस अभिरक्षा में विवाह कार्यक्रमों में जाने की अनुमति दी, लेकिन तीन अन्य मामलों में एडीजे कोर्ट से राहत न मिलने के कारण वह जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे।
छह मामलों में खारिज हुई याचिका
बाबूलाल कटारा ने अपने इकलौते बेटे डॉ. दीपेश कटारा के विवाह का हवाला देते हुए 60 दिन की अंतरिम जमानत की मांग की थी। उनके बेटे का विवाह 12 दिसंबर को तय हुआ है। कटारा के वकील भानुप्रकाश शर्मा ने अदालत में दलील पेश की कि प्रार्थी के इकलौते बेटे की शादी से संबंधित धार्मिक रस्में निभाना पिता की जिम्मेदारी है। इस आधार पर उन्हें 60 दिन के लिए अंतरिम जमानत पर रिहा किया जाए। इसके विपरीत, सीबीआई, ईडी और एडीजे कोर्ट ने मामलों की गंभीरता को देखते हुए अंतरिम जमानत देने से साफ इन्कार कर दिया।
तीन मामलों में मिली थी पुलिस हिरासत
जयपुर महानगर प्रथम की सीबीआई और ईडी कोर्ट ने वरिष्ठ अध्यापक ग्रेड द्वितीय भर्ती परीक्षा के पेपरलीक से जुड़े तीन मामलों में कटारा को 60 दिन की अंतरिम जमानत देने से इन्कार किया। हालांकि अदालत ने उन्हें 9 दिसंबर से 13 दिसंबर तक पुलिस अभिरक्षा में विवाह कार्यक्रमों में शामिल होने की अनुमति प्रदान की। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस दौरान सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम जेल प्रशासन करेगा। परंतु, एडीजे कोर्ट से अनुमति न मिलने के कारण कटारा इस छूट के बाद भी जेल से बाहर नहीं आ सकेंगे।
एडीजे कोर्ट से नहीं मिली कोई छूट
दूसरी तरफ, जयपुर महानगर द्वितीय की एडीजे कोर्ट-1 में एसआई भर्ती-2020, स्कूल लेक्चरर भर्ती 2022 और कृषि व्याख्याता भर्ती परीक्षा से संबंधित तीन मामले लंबित हैं। इन मामलों में भी बाबूलाल कटारा ने बेटे के विवाह का हवाला देकर 60 दिन की अंतरिम जमानत मांगी थी। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं और उन्हें विवाह समारोह में शामिल होने की कोई छूट नहीं दी।
जनहित और जांच का दिया तर्क
सुनवाई के दौरान एसओजी के विशिष्ट लोक अभियोजक बीएस चौहान और ईडी ने याचिका का पुरजोर विरोध किया। अभियोजन पक्ष ने कहा कि कटारा के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय समेत कुल छह मामले लंबित हैं। आरोपी ने एक जिम्मेदार पद पर रहते हुए पेपरलीक जैसे गंभीर कृत्य में सहभागिता निभाई है। ऐसे में जमानत देने से जांच की निष्पक्षता बाधित होगी और जनहित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इसलिए आरोपी का न्यायिक हिरासत में रहना अत्यंत आवश्यक है।