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Rajasthan: दौसा के जिन बुनकरों ने बनाया था स्वतंत्र भारत का पहला खादी का तिरंगा...आज उनकी हालत दयनीय

Wed, 14 Aug 2024 08:11 PM IST
अरविंद कुमार न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, दौसा

सार

स्वतंत्र भारत का पहला खादी का कपड़ा जिस आलूदा गांव में तैयार हुआ, वहां कभी 200 से अधिक परिवार हाथ से खादी तैयार किया करते थे। आज गांव में कुछ ही खादी बुनने की हाथ की मशीनें बची हैं, जो अपनी न्यूनतम मजदूरी के लिए भी मोहताज हैं।
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आलूदा गांव के बुनकर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दौसा जिले का नाम वैसे तो हमेशा चर्चाओं में रहा है। लेकिन यहां के बुनकरों ने आजादी के साल के दौरान दौसा का नाम बुलंदियों पर ला दिया था। अब जानिए इतिहास दौसा के आलूदा गांव का, जहां से देश की आजादी के समय से दौसा को प्रसिद्धि मिली। दौसा से करीब 14 किलोमीटर दूरी पर एक छोटा सा गांव आलूदा है। आलूदा देश भर में इसलिए प्रसिद्ध है कि आजादी का पहला तिरंगा आलूदा के चौथमल बुनकर ने बनाया था, जिसे 15 अगस्त 1947 को लाल किले किले की प्राचीर पर फहराया गया था।

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उधर, तिरंगे के कपड़ा निर्माता चौथमल बुनकर का निधन कई दशकों पहले हो गया। उसके बाद चौथमल बुनकर का परिवार करीब 40 साल पहले गांव छोड़कर रोजगार की तलाश में आलूदा से पलायन कर चुका है। इधर, खड़ी ग्राम उद्योग बोर्ड के मंत्री अनिल शर्मा ने बताया कि देश की आजादी के समय देश भर में चार जगह से तिरंगे मंगवाए गए थे, जिनमें से दौसा जिले का भी एक तिरंगा था और वो आज भी दिल्ली में राष्ट्रीय धरोहर के रूप में संजोया गया है।

हालांकि, यह बात आज तक भी स्पष्ट नहीं है कि जो तिरंगे आजादी के समय लाल किले से लहराने को मंगवाए थे, उनमें से कौन सा तिरंगा लाल किले की प्राचीर पर लहराया था, यह बात स्पष्ट नहीं है। लेकिन तत्कालीन समय के तिरंगा कपड़ा बुनकर चौथमल ने खुद इस बात का कई बार दावा किया था कि लाल किले की प्राचीर पर पहला तिरंगा दौसा के कपड़े से बनकर आया था। जो आलूदा गांव के बुनकर चौथमल के घर के बाहर आज भी साइन बोर्ड लगा है, जिस पर लिखा हुआ है 1947 के भारतीय प्रथम झंडा बुनकर चौथमल निवास लाल किले की शान।
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खादी बोर्ड के मंत्री अनिल शर्मा की माने तो उस समय आजादी की लड़ाई के दौरान गोविंदगढ़ गांव में तमाम आजादी के दीवानों का गढ़ हुआ करता था। उस समय देश पांडे और टाट साहब द्वारा आजादी के तिरंगे का कपड़ा दौसा के चौथमल बुनकर के यहां से ले जाया गया था। बताया तो यह भी जाता है कि खुद देश पांडे और टाट साहब ने उसे तिरंगे को अपने हाथ से कलर करके बनाया और देश की आजादी के समय लाल किले पर लहराया।

अब समझिए इन तिरंगा बुनकरों का दर्द
बुनकरों की माने तो ये लोग आज भी न्यूनतम मजदूरी से नीचे की मजदूरी पर भी काम करते हैं। इनका कहना तो यहां तक भी है कि खादी के लिए इन लोगों ने अपने आप को समर्पित कर दिया। लेकिन कहीं से इन्हें इतना भी नहीं मिल पाता कि उनके घर का गुजारा चल सके, जिसे लेकर कई बार सरकार के सामने भी पहल किए गए। लेकिन सरकार भी इन बुनकरों की फरियाद को आज तक पूरा नहीं कर पाई। परिणाम यह रहा कि अब यह बुनकर इस काम को छोड़ने की कगार पर आ गए हैं। 

आजादी से लेकर अब तक चरखे की जरिए काम कर रहे बुनकर चिरंजीलाल महावर का कहना है, सरकार सहारा देती तो बुनकर इस परंपरा से जुड़े रहते। चरखे से सूत बनाने पर इनको दिन भर काम करके 152 रुपये के आसपास ही मिलते हैं। इधर, इन बुनकरों की सरकार से प्रार्थना है कि जल्द ही इनकी न्यूनतम मजदूरी वाली बात को नहीं सुना गया तो वह दिन दूर नहीं जब खादी के यह बुनकर अपना पारंपरिक काम छोड़कर दूसरे कामों में लग जाएंगे। मजदूरी के मामले में खादी ग्राम उद्योग समिति दौसा के मंत्री अनिल शर्मा ने कहा, हमने ऊपर के स्तर पर खादी के इस काम को मनरेगा से जोड़ने बात भी की है। लेकिन आज तक कोई सफल परिणाम नहीं आया। अब देखने वाली बात यह भी होगी कि क्या सरकार खादी के इन बुनकरों को न्यूनतम मजदूरी दे पाएगी?

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