खानापूर्ति के बीच चल रहा सड़क सुरक्षा माह
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दौसा जिले में सड़क सुरक्षा माह के दौरान सड़क सुरक्षा के तमाम नियमों को ताक पर रखकर ट्रैफिक पुलिस वाले स्टाफ कम होने का बहाना बताकर कानूनी कार्रवाई करने से बचते नजर आते हैं। बात चाहे गांधी तिराहे दौसा की हो या फिर कलेक्ट्रेट चौराहा बाइपास की या फिर जहां भी ट्रैफिक पुलिस ने अपने पॉइंट बनाए हैं, वहां महज खानापूर्ति के बीच सड़क सुरक्षा माह चलाया जा रहा है।
दौसा के सड़क सुरक्षा माह की यदि हम बात करें तो यह किस्सा केवल दौसा जिले का ही नहीं, बल्कि और भी कई जिलों में सड़क सुरक्षा माह के चलते खानापूर्ति देखने को मिल जाएगी। जबकि सड़क सुरक्षा सप्ताह हो या सड़क सुरक्षा माह, इस दौरान सड़क पर चलने वाले लोगों को यातायात के नियमों की तमाम जानकारियों से अवगत कराया जाता है। सड़क पर खुद की सुरक्षा किस तरीके से करनी है, उसके लिए भी सड़क सुरक्षा सप्ताह और माह में बात की जाती है। इसी बीच दौसा जिले में चल रहे सड़क सुरक्षा माह में अनियमितताओं के बीच लोग न तो मोटरसाइकिल सवार हेलमेट लगाते नजर आते और न हीं चारपहिया वाहन चालक ड्राइविंग सीट पर बैठने के बाद सीट बेल्ट लगाते नजर आ रहे हैं।
दौसा जिले मे ये कैसा सड़क सुरक्षा माह चलाया जा रहा है, जिसमें जिम्मेदार लोग अपनी ड्यूटी से पल्ला झाड़कर इधर-उधर आसपास की दुकानों के बाहर बैठे नजर आते हैं। यदि मीडिया कहीं इन जिम्मेदारों को नजर आ जाए तो यह तुरंत सड़क के बीचो-बीच जाकर अपना काम शुरू कर देते हैं।जबकि सरकारों को हमारी इतनी चिंता है। इसीलिए तो बार-बार ट्रैफिक नियमों की सही पालना हो, उसके लिए सड़क पर चलने वाले राहगीर और साधन संपन्न लोगों को ट्रैफिक नियमों को समझाया जाता है।
लेकिन दौसा सहित प्रदेश भर में राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह 15 जनवरी से 14 फरवरी तक चलने वाले राष्ट्रीय सड़क सुरक्षा माह पोल खुली है। दौसा शहर के गांधी तिराहे पर अधिक वाहनों का भार रहता और यहां यातायात व्यवस्था को लेकर ट्रैफिक पुलिस के जवान तैनात रहते हैं। बात करें ट्रैफिक नियमों की तो दोपहिया वाहन चालक सहित चौपहिया वाहन ट्रैफिक नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते नजर आ रहे हैं।
दौसा की ट्रैफिक पुलिस ड्यूटी पर तैनात एक ट्रैफिक कांस्टेबल का कहना है कि ट्रैफिक पुलिस में स्टाफ की कमी के कारण वाहन चालकों के खिलाफ कार्रवाई कम हो पाती है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि एक हवलदार को चालान काटने का पावर नहीं होता है। जबकि अधिकांश समय ट्रैफिक पुलिस के हवलदार ही अपनी ड्यूटी और चालान दोनों को एक साथ अंजाम देते हैं।