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Rajasthan: बाड़मेर के जसोल में एक घर के बाहर लगी लंबी कतार, लोग अपनी बारी का कर रहे इंतजार

Sun, 15 Jan 2023 09:18 AM IST
अर्पित याग्निक न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बाड़मेर

सार

घर में मौत हुई है फिर भी जश्न का माहौल है। दंपती के दर्शन के लिए आसपास के गांव के लोग भी जुट रहे हैं। लोगों के उत्साह को देखकर कर लगता है कोई उत्सव मना रहे हैं।  
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संथारा ग्रहरण करने वाला दंपती - फोटो : Amar Ujala Digital
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विस्तार
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बाड़मेर जिले के जसोल कस्बा निवासी पुखराज संकलेचा और उनकी पत्नी के एक फैसले ने पूरे कस्बे में उत्सव का माहौल बना दिया। दरअसल, 18 दिन पहले 83 वर्ष के पुखराज संकलेचा और उनकी 81 वर्षीय पत्नी गुलाबी देवी ने संथारा ग्रहण किया था, तभी से दूर-दूर से लोग इस दंपती के दर्शन करने जसोल में संकलेचा निवास पर पहुंच रहे थे। संकलेचा परिवार के भी 150 से ज्यादा सदस्य देशभर से जसोल पहुंच चुके थे।

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ये है दंपती की संथारा लेने की कहानी
गुलाबी देवी ने दस साल पहले जब उनकी दोहिती ने दीक्षा ली थी तभी तय कर लिया था कि दीक्षा के दस वर्ष पूरे होने पर संथारा लेंगी, लेकिन परिवार ने उन्हें संथारा लेने से रोका हुआ था। वहीं उनके पति पुखराज (83 वर्ष) का संथारा का कोई विचार नहीं था। इसी बीच गत सात दिसंबर को पुखराज को हार्ट अटैक आया और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां से वो 16 दिसंबर को स्वस्थ होकर घर लौट आए। इसके बाद उनको जीवन से विरक्ति को गई। 27 दिसंबर को उन्होंने भोजन-दवा छोड़ दी और कहा मैं अब संथारा पर हूं। उन्हें सुमति मुनि के सान्निध्य में संथारा दिलाया गया। उनके पीछे-पीछे पत्नी गुलाबी देवी ने भी भोजन-पानी छोड़ दिया, लेकिन इसी दौरान तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्य महाश्रमण आने वाले थे। सो उन्होंने तीसरे दिन पानी लेना शुरू कर दिया।

पुखराज संकलेचा ने त्यागी देह
पति के देहांत के बाद पत्नी भी पार्थिव शरीर के पास बैठ गई और णमोकार मंत्र का जाप शुरू कर दिया है। दंपती ने साथ में संथारा ग्रहण किया था और इच्छा थी कि दोनों साथ में देह त्यागे। हालांकि शनिवार सुबह 5 बजे 83 साल के पुखराज संकलेचा ने देह त्याग दी है।
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क्या है संथारा
जैन धर्म के अनुसार संथारा एक प्रथा है, जिसमें देह त्याग को पवित्र माना जाता है। जैन समाज में जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी मृत्यु निकट है तो वह खुद को एक कमरे में बंद कर खाना-पीना त्याग देता है। जैन शास्त्रों में इस तरह की मृत्यु को समाधिमरण, पंडितमरण अथवा संथारा भी कहा जाता है। जैन धर्म के अनुसार आखिरी समय में किसी के भी प्रति बुरी भावनाएं नहीं रखी जाएं। यदि किसी से कोई बुराई जीवन में रही भी हो, तो उसे माफ करके अच्छे विचारों और संस्कारों को मन में स्थान दिया जाता है। संथारा लेने वाला व्यक्ति भी हलके मन से खुश होकर अपनी अंतिम यात्रा को सफल कर सकेगा और समाज में भी बैर बुराई से होने वाले बुरे प्रभाव कम होंगे। इससे राष्ट्र के विकास में स्वस्थ वातावरण मिल सकेगा। इसलिए इसे इस धर्म में एक वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक विधि माना गया है।

बैंड बाजा डीजे के साथ निकली बैकुंठी यात्रा
संथारा शव यात्रा कार्यक्रम में हजारों की संख्या में लोग उमड़े। बैकुंठी यात्रा में ढोल नगाड़े, बैंड, डीजे के साथ लोग णमोकार मंत्र का जाप करते हुए मुक्तिधाम की ओर बढ़ें। इस यात्रा में ट्रैक्टरों पर भी जैन समाज के लोग भजनों के साथ बैकुंठी यात्रा के लिए रवाना हुए थे। चंदन और पीपल की लकड़ी से दी गई मुखाग्नि, पुखराज संकलेचा के पुत्रों  ने चंदन और पीपल की लकड़ी से मुखाग्नि दी। घर का एक वरिष्ठ सदस्य संसार छोड़ गया और दूसरा उसी राह पर है, लेकिन माहौल शोक का होने के बजाय उत्सव का है। सबके चेहरे पर भक्ति भाव है। इसलिए जसोल में संथारा के उत्सव की तैयारी है।

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