भाजपा की ऐतिहासिक जीत में इस समाज की बड़ी भूमिका मानी जा रही थी, क्योंकि 163 सीटें बिना जाट समाज के वोट के राजस्थान में संभव नहीं है। लेकिन पिछले तीन सालों में भाजपा से बागी विधायक हनुमान बेनीवाल ने भाजपा के खिलाफ और खासकर वसुंधरा राजे के खिलाफ जमकर माहौल बनाया है। उन्होंने शेखावाटी से लेकर पश्चिमी राजस्थान तक किसान व जाट समाज की रैलियों में अच्छी खासी भीड़ जुटाई है और अब उनकी अगली रैली जयपुर में होने वाली है, जिसमें वे सबसे अधिक जोर लगा रहे हैं।
सरकार पलटने की क्षमता रखने वाले इस समाज को खुश रखने से ही भाजपा की इस चुनाव में बात बन सकती है। इधर, राजपूत समाज से नेता मानवेंद्र सिंह ने भी भाजपा के कमल के फूल को अपनी भूल बताते हुए कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। इस घटना से भाजपा के नेताओं का मानना है कि राजपूत समाज के, खासकर पश्चिमी राजस्थान के वोट टूट सकते हैं। राजनीतिक पार्टियों के आंकलन के हिसाब से राजस्थान में राजपूत वोट बैंक करीब 4 से 5 प्रतिशत है।
लेकिन राजस्थान की राजनीति में इस समाज का प्रतिनिधित्व काफी अधिक रहता है। वर्तमान विधानसभा में राजपूत समाज से करीब 27 विधायक हैं। राजपूत समाज को भाजपा को वोटर माना जाता है, यदि ये वोट बैंक छिटकता है, तो कांग्रेस को लाभ होगा। वर्तमान में भाजपा के 24 विधायक राजपूत समाज से हैं। यदि मानवेंद्र के भाजपा से नाराज होने से इन राजपूत समाज के नेताओं पर प्रभाव पड़ा, तो भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है।
वहीं, ब्राह्मण समाज के चेहरा माने जाते रहे वरिष्ठ विधायक व पूर्व मंत्री घनश्याम तिवाड़ी भी वसुंधरा राजे से रूठकर भाजपा छोड़ अपनी अलग पार्टी बना चुक हैं। उन्होंने सभी 200 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है। उन्होंने कहा है कि भाजपा के कई नेता उनसे सम्पर्क में हैं, ऐसे में वे भाजपा के ही वोट काटेंगे।
हालांकि ब्राह्मण वोट बैंक बंटा हुआ माना जाता है। इसलिए भाजपा घनश्याम तिवाड़ी को लेकर खास परेशान नहीं है। आरक्षण को लेकर नाराज गुर्जर समाज भाजपा को अधिक परेशान कर रहा है। हालांकि मीणा समाज को साधने के लिए विधायक व पूर्व सांसद किरोड़ी लाल मीणा को वसुंधरा राजे ने भाजपा में शामिल कर लिया है। गुर्जर व मीणा समाज के करीब 6-6 फीसदी वोट बैंक है। लेकिन राजनीतिक दलों के लिए दोनों ही समाज इसलिए जरूरी हैं क्योंकि यहां से एकमुश्त वोटिंग होती है।