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Baavanmata Dham Kekri: यहां जलती है अखण्ड ज्योत, 400 साल पहले महाराणा प्रताप के वंशज ने की थी स्थापना

Mon, 07 Oct 2024 03:45 PM IST
अरविंद कुमार न्यूूज डेस्क, अमर उजाला, केकड़ी

सार

नवरात्री में सावर स्थित बावनमाता मंदिर श्रद्धालुओं से भरा रहता है। मां आदिशक्ति के प्रतीक इस धाम पर पूरे नवरात्र में विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान के मंत्र गूंजते रहते हैं। शक्तावत वंश की कुलदेवी के रूप में विख्यात, आस्था व भक्ति के इस धाम पर सदैव अखंड ज्योत भी प्रज्ज्वलित रहती है।
 
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नवरात्रा में रोशनी से जगमगाता बावनमाता मंदिर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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केकड़ी जिले के सावर कस्बे में स्थित बावनमाता मंदिर अपने पौराणिक अतीत व चमत्कारिक किवदंतियों के लिए विख्यात है। करीब 400 साल पहले महाराणा प्रताप के वंशज राजा गोकुलदासजी शक्तावत ने उदयपुर के भींडर से माता को यहां लाकर विराजमान किया था। तभी से यह स्थान बावनमाता के धाम के नाम से प्रसिद्ध है। बावनमाता शक्तावत वंश की कुलदेवी है। आज भी हर नवरात्र में सावर, चौसला, देवली, कोटा, टांकावास, देवखेड़ी, कुचलवाड़ा, जयपुर व पिपलाज सहित अन्य कई स्थानों से शक्तावत वंश के वंशज पूजा अर्चना के लिए यहां आते हैं।

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मंदिर के पुजारी प्रकाश लौहार ने बताया कि मंदिर में हमेशा अखंड ज्योत प्रज्वलित रहती है। मंदिर में 51 फीट ऊंचा त्रिशूल भी स्थापित किया गया है। पूर्व में यह स्थान बाणमाता के नाम से प्रसिद्ध था, जो धीरे-धीरे अपभ्रंश होकर बावनमाता के नाम से जाना जाने लगा है। उन्होनें बताया कि बावनमाता मंदिर परिसर में राजपूत और पांचाल समाज की दो सतीमाता भी विराजमान है। 

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मंदिर में स्थापित बावनमाता की प्रतिमा

नवरात्रा में होते हैं कई धार्मिक अनुष्ठान
यहां यों तो साल भर ही भक्तों के दर्शन करने आने का सिलसिला बना रहता है, पर शारदीय नवरात्रों में मंदिर परिसर भक्ति व आस्था की विशेष भावना से ओतप्रोत श्रद्धालुओं से भरा रहता है। नवरात्रा के दौरान सप्तमी तिथि को यहां 121 जलकलशों के साथ विशाल शोभायात्रा निकाली जाती हैं तथा अगले दिन अष्टमी पर यहां विशाल वार्षिक मेला भरता है। इससे पूर्व मंदिर प्रांगण में विशाल भजन संध्या आयोजित की जाती है, जिसमें ग्रामीणों की भारी भीड़ उमड़ती है।

राजा गोकुलदासजी ने की स्थापना
मंदिर के इतिहास को लेकर बताया गया कि मेवाड़ के राजा महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्तिसिंह के पोते गोकुलदास शक्तावत ने सन 1684 में सावर रियासत की गद्दी संभाली थी। उस समय उन्हें रियासत में कुल 2700 गांव उपहार स्वरूप मिले थे। तब गोकुलदासजी ने उदयपुर के भींडर से बाणमाता को लाकर सावर में विराजमान किया था। तभी से बाणमाता को सावर सत्ताइसा (सत्ताइस सौ) की कुलदेवी के नाम से पूजा जाता है। धीरे-धीरे गुजरते समय के साथ बाणमाता का नाम अपभ्रंश होकर बावनमाता हो गया।
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मित्र मंडल ने कराया मंदिर का सौन्दर्यीकरण
बावनमाता मित्र मंडल के नाम से 25 सदस्यों का एक संगठन सामाजिक सेवाएं देते हुए इस मंदिर के रखरखाव व सौन्दर्यीकरण का जिम्मा उठाये हुए है। मंडल के सदस्य देवराज कुमावत और बाबूलाल पांचाल ने बताया कि संगठन द्वारा माता के निज मंदिर की छत की मरम्मत, मंदिर का रंग रोशन, सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाने का कार्य कराया गया है। इसके अतिरिक्त यहां मंदिर के मुख्य द्वार का निर्माण, प्राचीन जीर्ण-शीर्ण बावड़ी का जीर्णोद्वार तथा यहां एक भोजनशाला का निर्माण भी करवाया गया है।

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