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राजस्थान विधानसभा चुनाव: कांग्रेस-भाजपा के कद्दावर नेता अपनों को टिकट दिलाने की जुगत में लगे

Mon, 22 Oct 2018 06:13 PM IST
चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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भाजपा-कांग्रेस
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राजस्थान विधानसभा चुनाव सिर पर हैं और प्रत्याशियों की सूचियां कभी भी जारी हो सकती हैं। इस माहौल में भाजपा और कांग्रेस, दोनों ही पार्टियों के नेता टिकट पाने के लिए दिल्ली और जयपुर में आला नेताओं के यहां चक्कर काट रहे हैं। खास बात यह है कि दोनों ही पार्टियों में हर सीट पर औसतन 15-15 दावेदार हैं। बिना सीएम चेहरे के विधानसभा चुनाव में उतर रही कांग्रेस में अपने चहेतों को टिकट दिलवाने के लिए प्रदेश के दो बड़े नेताओं के बीच घमासान है। 
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नेता आलाकमान के सामने संबंधित सीट पर अपने चहेते को टिकट दिलवाने के लिए जमकर पैरवी कर रहे हैं। इधर, भाजपा में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी अपने हिसाब से ही टिकट वितरण करना चाहती हैं, लेकिन भाजपा आलाकमान पूरी लगाम उन्हें नहीं सौंपना चाह रहा। आलाकमान ने स्पष्ट किया है कि चेहरा भले ही राजे रहेंगी, लेकिन टिकट वितरण का काम आलाकमान के हाथ में रहेगा।

राजस्थान विधानसभा में 200 सीटें हैं और प्रदेश नेतृत्व व आलाकमान तीन-तीन हजार प्रत्याशियों की दावेदारी से जूझ रहा है। चुनाव में टिकट वितरण के इस महत्वपूर्ण मोड़ पर कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही पार्टियों की 'कहानियां' कुछ अलग-अलग हैं। हालतों को देखते हुए कहा जा सकता है कि टिकट वितरण के लिए कांग्रेस व भाजपा के आलाकमान की और दोनों के प्रदेश नेतृत्व की सोच में अंतर है। आलाकमान जिताऊ उम्मीदवार पर बाजी खेलना चाहता है, तो प्रदेश नेतृत्व अपने प्रभुत्व को कायम रखने के लिए अपने हिसाब से टिकट वितरण करवाना चाहते हैं।
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'राज' में छिपा है टिकट दिलवाने का राज

इस चुनाव में कांग्रेस की बागडोर दो बड़े नेताओं के हाथ में है और दोनों ही मुख्यमंत्री पद के लिए मजबूत दावेदार हैं। इनमें से एक दो बार मुख्यमंत्री रहे व राष्ट्रीय महासचिव अशोक गहलोत हैं, तो दूसरे, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के नजदीकी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट। गहलोत तीसरी बार फिर मुख्यमंत्री बनने का मोह नहीं छोड़ पा रहे हैं। गहलोत ने सीएम चेहरे के रूप में खुद को प्रोजेक्ट करने में पिछले दिनों विवादित बयान जारी किए और उनके गुट के माने जाने वाले यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे लालचंद कटारिया सहित बड़े नेताओं ने आलाकमान से गहलोत को सीएम चेहरा घोषित करने की मांग कर डाली। एक तरह से उन्होंने पार्टी को मुश्किल में भी डाला और प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे को कहना पड़ा कि ऐसे बयानों से नेता पार्टी को धोखा दे रहे हैं, गद्दारी कर रहे हैं।

 
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वहीं, राहुल गांधी ने पायलट को प्रदेश की कमान तब सौंपी थी, जब पिछले विधानसभा व लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ऐतिहासिक हार हुई थी। लेकिन उनके नेतृत्व में पार्टी ने लोकसभा व विधानसभा के उप चुनवों में उल्लेखनीय तरीक से वापसी की है। दोनों चाहते हैं उनके गुट के अधिक से अधिक नेताओं को टिकट मिले, जिससे जीत के बाद मुख्यमंत्री बनने के लिए आसानी से विधायक दल की सहमति मिल जाए। टिकट वितरण में किस नेता की कितनी चली, उससे यह जरूर संकेत मिलेगा कि मुख्यमंत्री पद के लिए आलाकमान का हाथ दोनों में से किस नेता के सिर पर है।

सत्ता जाने का डर

इधर, राजस्थान में शुरुआती साढ़े तीन वर्ष तक काफी सुस्त चाल से चली भाजपा की वसुंधरा राजे सरकार को लेकर पिछले वर्ष से इस वर्ष तक यह चर्चा भी बार-बार जोरों पर चली कि आलाकमान मुख्यमंत्री को बदल सकता है। लेकिन चुनावी साल में तेजी से सक्रिय हुईं, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष पद पर अपने हिसाब से नेता चुना और फिर इस चुनाव में सीएम चेहरा भी घोषित हुईं। राजे भी अपने चहेतों को अधिक से अधिक टिकटें दिलवाना चाहती हैं, जिससे भाजपा जीते तो उनकी दावेदारी कायम रहे और किसी तरह की कोई अड़चन का सामना नहीं करना पड़े। वहीं, आलाकमान को राजस्थान सरकार से समाजों, कर्मचारियों व बेरोजगारों की चल रही नाराजगी से सत्ता जाने का डर सता रहा है। इस माहौल में आलाकमान टिकट वितरण की जिम्मेदारी अकेले वसुंधरा राजे पर कतई नहीं छोड़ना  चाहता। इस कारण भाजपा आलाकमान टिकट वितरण में फूंक-फूंक कर कदम बढ़ा रहा है। प्रदेश प्रभारी बनाए गए केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने भी स्पष्ट कर दिया है कि टिकट वितरण उनके हाथों में रहेगा। भाजपा में भी टिकट वितरण के खेल को देखना रोचक रहेगा।

(ब्यूरो)
 
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