पंजाब की मिट्टी की खुशबू के लिए मर मिटने वाले एनआरआई अपनी सरजमीं से दूर भाग रहे हैं। पंजाब में निवेश तो दूर की बात है एनआरआईज अपनी जमीन जायदाद बेचने के लिए कतार लगाकर खड़े हैं। एनआरआई के लिए सूबे में पांच एजेंसियां व एक मंत्रालय काम कर रहा है लेकिन रिजल्ट शून्य है और हालात यह हैं कि छह साल से एनआरआई के लिए संगत दर्शन नहीं हुआ और न ही एनआरआई सम्मेलन।
प्रकाश सिंह बादल ने अपनी सरकार में लांबड़ा में एक एनआरआई द्वारा शुरू की जा रही आलू की प्रोसेसिंग कंपनी का नींव पत्थर रखा था। उन्होंने कहा था कि एनआरआईज का पंजाब में स्वागत है, लेकिन एनआरआई को अधिकारियों ने अपने जाल में ऐसा उलझाया कि वह कंपनी को शुरू करने से पहले ही विदेश चला गया।
एनआरआई की समस्याओं के समाधान के लिए सभा का गठन किया गया था, जिसका पांच साल तक चुनाव नहीं हुआ। 2015 में चुनाव हुए, उसके बाद पांच साल तक कोई चुनाव नहीं हुआ। 2020 में जब किरपाल सिंह सहोता को प्रधान बनाया गया लेकिन कोविड के कारण वह अमेरिका चले गए और यहां पर कामकाज बिलकुल ठप हो गया। वह कुछ समय के लिए बीच में आए लेकिन वापस निकल गए। करीब 55 लाख पंजाबी विदेशों में सेटल हैं। एनआरआईज की समस्याओं के समाधान के लिए 1990 में एनआरआई सभा की स्थापना की गई। इसके करीब 23,000 सदस्य हैं और हर साल होने वाला एनआरआई सम्मेलन और एनआरआई संगत दर्शन भी नहीं हो सका। सरकार के उदासीन रवैये के चलते विदेश में बसे लाखों पंजाबी पंजाब में निवेश को तैयार नहीं हैं।
एनआरआई सभा के पूर्व प्रधान कहते हैं कि पंजाब में एनआरआईज जमीन बेच सकते हैं लेकिन खरीदने के लिए केंद्र सरकार की आज्ञा लेनी पड़ती है। यहां खेतीबाड़ी की जमीन खरीद नहीं सकते, वह अपनी मिट्टी के साथ जुड़ेंगे कैसे? दूसरा, कोई एनआरआई पंजाब में निवेश क्यों करेगा? यहां पर बिजली 11 रुपये यूनिट है बाकी सूबे में 5 रुपये। फिर, यहां की अफसरशाही का सबको पता है, किस तरह से एनआरआई को देखते ही उलझाती है। मेरे दोस्त हैं, जिन्होंने पंजाब में प्रोजेक्ट लगाने की तैयारी की थी लेकिन सब बैकफुट पर हो गए।
यूके में रहने वाले शरणजीत सिंह औजला का कहना है कि हमारी अगली पीढ़ी पंजाब आने के लिए तैयार नहीं है। पंजाब में एनआरआईज के साथ सकारात्मक रवैया अख्तियार नहीं किया जाता। यहां हम प्रापर्टी बेच रहे हैं, खरीद नहीं रहे हैं। पुश्तैनी जमीनों को बेचने लिए जोर लगाया जा रहा है। बाहर विदेशों में पंजाब में कानून व्यवस्था को लेकर काफी नकारात्मक माहौल बना हुआ है, जिससे एनआरआईज खौफजदा हैं, पंजाब में निवेश ही नहीं, आने से भी घबराने लगे हैं।
नामवर बिल्डर बलजिंदर सिंह अरोड़ा पप्पी का कहना है कि हमारे पास रोजाना एनआरआई कॉल्स तो आती है लेकिन वह बेचने की बात करते हैं, खरीदने की नहीं। पहले जमीनों को खरीदने में एनआरआईज नंबर वन होते थे लेकिन अब खरीदारी जीरो फीसदी है जबकि बेचने के लिए हजारों एनआरआईज कतार में हैं।