मोहाली। कोरोना काल के बीते दो साल के दौरान भी वैज्ञानिकों ने कृषि क्षेत्र में अद्भुत प्रयास किए और नए-नए अविष्कार करके उपलब्धियां हासिल की हैं। यह जानकारी मंगलवार को नेशनल एग्री फूड बायोटेक्नोलॉजी इंस्टीच्यूट (नाबी) में आयोजित न्यूटन भाभा फंड रिसर्च लिंक पर आयोजित पर्यावरण ‘तनाव के बीच खाद्य उत्पादन’ नामक वर्कशॉप के दौरान एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अश्वनी पारिक ने अपने संबोधन में दी। इस वर्कशॉप का आयोजन वर्चुअल तरीके से हुआ, जिसमें नाबी के अलावा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), इंटरनेशनल सेंटर फॉर जेनेटिक इंजीनियरिंग एंड बायोटेक्नोलॉजी (आईएसईबी), बर्मिंघम विश्वविद्यालय (यूके), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट जीनोम रिसर्च (एनआईपीजीआर) की ओर से संयुक्त रूप से किया गया।
इस अवसर पर साइंस एंड टेक्नोलॉजी राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह बतौर विशेष अतिथि शामिल हुए और उन्होंने संयुक्त रूप से आयोजित वर्कशॉप में वैज्ञानिकों की जमकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि कोरोना कॉल में भी वैज्ञानिकों ने कृषि क्षेत्र में जो काम किया, वह अद्भुत है। इस वर्कशॉप में सबसे पहले बर्मिंघम यूनिवर्सिटी से क्रिस्टाइन फेयर ने विचार साझा किए और इनके बाद ब्रिटिश काउंसिल इंडिया की नार्थ जोन की निदेशक राशी जैन के अलावा पीएस परोडा ने विस्तारपूर्वक जानकारी साझा की।
इस वर्कशॉप के दौरान देश और विदेश से जुड़े केंद्रों के प्रमुखों द्वारा कोविड कॉल के दौरान पैदा हुए हालात को लेकर अपने-अपने विचार पेश किए और बताया कि मौसम के बदलाव में वैज्ञानिक लगातार अपने शोध में जुड़े रहें। जबकि कोरोना कॉल ने लोगों की जीवनशैली को पूरी तरह से बदलकर रख दिया और ऐसा समय वैज्ञानिकों के लिए बिल्कुल अलग था। क्योंकि हर व्यक्ति कोरोना से इतना डरा था कि उसे केवल और केवल अपनी सेहत की सबसे ज्यादा चिंता थी। दूसरी ओर, मौजूदा परिस्थितियां ऐसी हैं कि लोग अब अपनी सेहत को लेकर ज्यादा गंभीर हो गए हैं और खाने से पहले हर चीज की जांच परख करके इस्तेमाल में लाते हैं।