जीरकपुर। शहर के आसपास के गावों में नगला, गाजीपुर और सनौली में किसान अपने खेतों में धड़ल्ले से धान की पराली जला रहे हैं। अगर समय रहते इन्हें रोका नहीं गया तो कोरोना काल में फेफड़े से संबंधित बीमारियों को झेल रहे लोगों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। क्योंकि इन गांवों के आसपास के सोसाइटी के लोगों को धुएं की वजह से सुबह और शाम के समय सांस लेने में परेशानी होने लगी है। हालांकि प्रशासन ने पराली जलाने वालों पर निगरानी रखने के लिए कर्मचारियों की जिम्मेदारी तय की है। इसके बावजूद भी पराली जलाने पर क्षेत्र में किसी भी किसान पर कार्रवाई नहीं हुई है। इसका नतीजा यह है कि सुबह से शाम तक धान की फसल कटे खेतों से धुआं उठ रहा है, लेकिन प्रशासन की ओर से पराली जलाने वालों को रोकने के लिए कहीं कोई तत्परता दिखाई नहीं दे रही है।
उपजाऊ शक्ति होती है कम और बढ़ जाता है प्रदूषण
खेतों में धान की कटाई के बाद सरसों और गेहूं की बुआई शुरू हो जाती है। किसान इन फसलों की अगेती बुआई करने के लिए धान की कटाई का काम पूरा होने के बाद किसान खेतों में धान की पराली और फानों में आग लगा देते हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेत में पराली जलाने से मिट्टी का तापमान बढ़ जाता है। इससे भूमि की उपजाऊ शक्ति कम हो जाती है। वहीं मिट्टी में मौजूद किसान मित्र कीट भी नष्ट हो जाते हैं। इसका सीधा असर फसल के उत्पादन पर पड़ता है और वातावरण में प्रदूषण भी बढ़ जाता है।