मोहाली। सीबीआई की विशेष अदालत ने तीस साल पहले अमृतसर के गांव जसपाल सिंह के रहने वाले संतोख सिंह को जबरदस्ती घर से उठाने व अवैध हिरासत में रखने के मामले में पूर्व इंस्पेक्टर मेजर सिंह को दोषी ठहराते हुए दस साल की सजा और 70 हजार रुपये जुुर्माना लगाया है। दोषी को आईपीसी की धारा-364 में दस साल की कैद व पचास हजार जुर्माना, धारा-344 में बीस हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई है। इस मामले की पैरवी सीबीआई के वकील गुरविंदर सिंह व शिकायतकर्ता के वकील एडवोकेट सरबजीत सिंह वेरका व पुष्पिंदर ने की। सजा सुनाए जाने के बाद दोषी इंस्पेक्टर को जेल भेज दिया गया।
31 जुलाई 1991 की रात को थाना सदर तरनतारन के उस समय के मुंशी मेजर सिंह ने पुलिस पार्टी के साथ संतोख सिंह के घर गया था। साथ ही संतोख सिंह को जबरदस्ती घर से उठाकर थाने ले आया था। संतोख सिंह का परिवार कई दिनों तक थाने का चक्कर लगाता रहा, लेकिन पुलिस वाले उन्हें यह कहकर वापस भेज देते थे कि पूछताछ के बाद संतोख सिंह को घर भेज देंगे। संतोख सिंह को जब पुलिस नहीं छोड़ा तो परिवार ने उसे छुड़वाने के लिए प्रयास शुरू कर दिए। इस दौरान परिवार की हाईकोर्ट में मानवाधिकार के केस लड़ने वाले वकील से मुलाकात की। इसके बाद परिवार ने हाईकोर्ट की शरण ली।
हाईकोर्ट ने 23 फरवरी 1998 को केस सीबीआई को रैफर कर दिया। सीबीआई ने अपनी जांच के बाद इंस्पेक्टर मेजर सिंह के खिलाफ 28 अगस्त 1998 पर केस दर्ज कर लिया। इंस्पेक्टर मेजर सिंह के खिलाफ आईपीसी की धारा 364 व 344 के तहत 21 अप्रैल 1999 को अदालत ने चार्जशीट दाखिल की। दूसरी तरफ मेजर सिंह की तरफ से इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई। करीब 18 साल तक मामला ठंडे बस्ते में पड़ा रहा। गत साल हाईकोर्ट ने दो महीने में मामले को निपटाने के आदेश दिए। इसके बाद यह कार्रवाई की गई। संतोख सिंह की माता स्वर्ण कौर की तरफ से मुआवजे संबंधी अदालत में अपील दायर की गई। जिस संबंधी सीबीआई अदालत की तरफ से मुआवजे संबंधी केस जिला कानूनी सेवाएं अथारिटी को भेज दिया है।