जब हौसला बना लिया ऊंची उड़ान का, फिर देखना फिजुल है कद आसमान का... इस पंक्ति को सार्थक कर दिखाया है चंडीगढ़ के नजदीक बसे गांव पर्छ की रहने वाली दिव्यांग क्रिकेटर अंजलि ने। परिवार के आर्थिक रूप से कमजोर होने और अभावों में बचपन गुजरने के बावजूद 24 वर्षीय अंजलि ने कभी हौसला नहीं हारा।
सुन और बोल नहीं सकने के बावजूद उन्होंने क्रिकेट जैसे खेल को चुनकर महिला सशक्तिकरण का श्रेष्ठ उदाहरण पेश किया और राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर कई टूर्नामेंट खेले। परिवार और शहर का नाम रोशन किया। कुछ दिन पहले राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें श्रेष्ठ दिव्यांगजन का राष्ट्रीय पुरस्कार दिया है। इससे उनके हौसले और बुलंद हैं। परिवार भी काफी खुश है।
अंजलि के पिता मुल्लांपुर में कपड़े प्रेस करने का काम करते हैं जबकि मां गृहिणी हैं। अंजलि और उनके तीनों भाई न कुछ बोल सकते हैं, न ही कुछ सुन सकते हैं। बावजूद इसके अंजलि ने अपने हौसले के दम पर इस मुकाम तक खुद को पहुंचाया है। सभी बच्चों के दिव्यांग होने के चलते उन्हें पढ़ाने के लिए अंजलि के पिता परिवार समेत उत्तर प्रदेश से चंडीगढ़ के नजदीक बसे गांव पर्छ आ गए। अंजलि की पढ़ाई चंडीगढ़ सेक्टर-19 स्थित वाटिका स्कूल से हुई है। 12वीं पास कर उन्होंने दिव्यांग बच्चों को पढ़ाने का कोर्स भी किया।
भीख मांगना कलंक, दिव्यांगों के लिए अकादमी खोलना चाहती हैं
अंजलि ने अपने मनोभाव लिखकर शेयर किए। उनका मानना है कि कई दिव्यांग सड़क के किनारे भीख मांगते हैं। यह हमारे समाज के लिए कलंक है। इसके लिए कहीं न कहीं सरकार एवं समाज दोनों ही जिम्मेदार हैं। सरकारों एवं समाज के लोगों को दिव्यांग व्यक्तियों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए। दिव्यांगों की स्किल डेवलपमेंट कर रोजगार उपलब्ध कराना चाहिए ताकि वह आसानी से अपने परिवार का पालन पोषण कर सकें। अंजलि के अनुसार, बचपन से लेकर इस अवार्ड तक पहुंचने में उन्हें कई प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़ा। वह आने वाले समय में कुछ बनकर दिव्यांगों की मदद के लिए एक अकादमी खोलना चाहती हैं ताकि वह अपने जैसे दूसरे दिव्यांगों की मदद कर सकें।
दिव्यांगों के लिए सुविधाओं का अभाव
अंजलि के अनुसार, देश के अंदर दिव्यांगजनों के लिए सुविधाओं का अभाव है। इसके लिए स्कूल, कॉलेज, खेल के मैदान एवं जरूरत के अन्य संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। उन्होंने दिव्यांगों को संदेश दिया कि कभी भी किसी को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए। दिव्यांगता जन्मजात या किसी घटना के बाद किसी को हो सकती है लेकिन हौसलों से काम लेने पर मुकाम जरूर हासिल होता है।
हिंदी नहीं आती
अंजलि की पढ़ाई इंग्लिश मीडियम में हुई है। इस कारण उन्हें हिंदी नहीं आती। परिवार के सदस्यों से भी बात करने में काफी मुश्किल होती है क्योंकि सुनाई न देने के कारण सिर्फ इशारों में ही वह बात करती हैं।