जिले के ट्रांसपोर्ट विभाग ने आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी के एवज में आवेदनकर्ता एक्टिविस्ट से पांच करोड़ रुपये बतौर फीस मांगे हैं। आरटीआई एक्टिविस्ट करणदीप सिंह कैरों ने विभाग से वीआईपी नंबरों की पिछले दस साल की डिटेल मांगी थी। विभाग ने तर्क दिया कि जो जानकारी मांगी गई है, उसके जवाब के कागजों की संख्या दस लाख है। ऐसे में पचास रुपये प्रति कॉपी के हिसाब से पांच करोड़ रुपये फीस बनती है। फीस जमा कराने के बाद ही जानकारी दी जा सकती है।
करणदीप ने पिछले साल अक्तूबर में विभाग में आरटीआई डाली थी। इसमें पिछले दस साल में वीआईपी नंबर से आए पैसे, नंबर किस किस को दिए गए और कितने कितने के दिए गए हैं के बारे में पूछा गया था। साथ ही उन्होंने वीआईपी नंबरों की आरसी के दस्तावेजों की मांग की थी। करणदीप ने कहा कि पहली अक्तूबर में आरटीआई का कोई जवाब नहीं आया।
उन्होंने पहली अपील तीन दिसंबर को डाली। उसके बाद एडिशनल ट्रांसपोर्ट कमिश्नर ने 18 दिसंबर को लुधियाना के डीटीओ को सारा रिकार्ड लेकर अपने दफ्तर में तलब किया। डीटीओ नहीं पहुंचे तो एडिशनल स्टेट कमिश्नर ने डीटीओ लुधियाना को पत्र लिखकर आदेश दिया कि आरटीआई एक्टिविस्ट द्वारा मांगी गई जानकारी उन्हें दी जाए।
इसके बाद जब स्पीड पोस्ट के जरिए ट्रांसपोर्ट विभाग का जवाब करणदीप को मिला तो वह हैरान रह गए। डीटीओ की तरफ से मिले पत्र में साफ तौर पर लिखा था कि दस सालों के बीच दस लाख वाहन सड़कों पर उतरे हैं। मांगी गई जानकारी की दस लाख कॉपी बनती है। पचास रुपये कॉपी के हिसाब से दफ्तर में जमा करवाकर वह यह जानकारी ले सकते हैं। चिट्ठी पढ़ते ही वह हैरान हो गए। करणदीप का कहना है कि उनके हिसाब से यह राज्य का पहला मामला है कि किसी विभाग ने जवाब के बदले पांच करोड़ रुपये की फीस मांगी है।
डीटीओ दलविंदर जीत सिंह ने कहा कि यह फीस कानून के मुताबिक ही मांगी गई है। आरटीआई एक्टिविस्ट ने जितना रिकार्ड मांगा था। उसके हिसाब से जानकारी दी गई है।