पंजाब की सियासत की दिशा तय करने में विभिन्न धार्मिक डेरों व संस्थाओं की अहम भूमिका रहती है। अध्यात्मिक गुरुओं, महंतों से लेकर अन्य संस्थाओं के मुखी अपने इशारे भर से सियासी हवा का रुख बदलने का मादा रखते हैं। ऐसे में तमाम सियासतदानों ने अब डेरों के जरिये वोट बैंक को साधने की कवायद तेज कर दी है।
विधानसभा चुनाव लड़ रहे प्रत्याशी इन धार्मिक शख्सियतों की शरण में पहुंचकर सियासी आशीर्वाद लेने लगे हैं। मालवा, माझा से लेकर दोआबा तक इन संस्थाओं का अच्छा खासा दबदबा है और लाखों की संख्या में अनुयायी इस संस्थाओं व मिशन से जुडे़ हैं।
सूबे में कई प्रतिष्ठित डेरों व संस्थाओं (ब्यास, सिरसा, नामधारी, निरंकारी, जालंधर, लुधियाना) के अलावा कस्बों व गांवों के धार्मिक स्थलों व डेरों में राजनीतिक लोगों का नतमस्तक होने का सिलसिला शुरू हो गया है। प्रत्याशियों के करीबी (जो संबंधित डेरों के मुखियों के नजदीकी अथवा उनके श्रद्धालु हैं) उम्मीदवारों या उनके परिजनों को डेरों में ले जाकर डेरा मुखियों से आशीर्वाद दिला रहे हैं। कुछ नेताओं का प्रयास रहता है कि इन गतिविधियों की भनक किसी को नहीं लगे लेकिन सियासत का खेल ऐसा है कि हरेक गतिविधि देर सवेर उजागर हो रही है। कुछ नेता इन गतिविधियों का जमकर प्रचार कर रहे हैं। संतों व महंतों के साथ तस्वीरों को सोशल मीडिया पर डाला जा रहा है, ताकि डेरों या संस्था से जुडे़ श्रद्धालु सीधे तौर पर उनके पक्ष में आ जाएं।
वक्त पर खोलेंगे पत्ते
संस्थाओं के मुखी फिलहाल चुप्पी साधे हुए हैं और सभी को आशीर्वाद दे रहे हैं। सूत्रों के अनुसार धार्मिक मुखी, प्रत्याशियों से खुलकर बातचीत करने से परहेज कर रहे हैं और मुस्कुराते हुए टालने की कोशिश हो रही है। डेरों से जुडे़ लोगों की मानें तो मतदान से 24 या 48 घंटे पहले ही मुखी इस संबंधी अपने पत्ते खोलते हुए फरमान सुना सकते हैं। इस दौरान संस्थाओं के मुखी अपने मुख्य सेवादारों से सियासत का फीड बैक हासिल कर रहे हैं। किसान आंदोलन के समाप्त होने से बदले हालात पर भी धार्मिक गुरु नजर बनाए हुए हैं। (संवाद)