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चुनौतियों से भरा है पंजाब के नए मु्ख्यमंत्री का रास्ता

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जालंधर। कांग्रेस हाईकमान ने बेशक चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम की कुर्सी सौंप दी हो, लेकिन यह सफर उनके लिए आसान नहीं बल्कि कांटों से भरा होने वाला है। करीब चार महीने बाद पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं और ऐसे में चन्नी के सामने खुद के साबित करने से लेकर 2022 में कांग्रेस की सत्ता में वापस लाना सबसे बड़ी चुनौती है। जहां कांग्रेस की गुटबाजी को संभालना आसान काम नहीं है वहीं कैप्टन के चहेते अधिकारियों और टीम से काम लेना भी एक बड़ी चुनौती होगी।
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पंजाब में बिजली मुद्दा
पंजाब में सत्ता पाने के लिए आम आदमी पार्टी तमाम बड़े वादे कर रही है, जिसमें 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने का भी वादा किया है। इस समय पंजाब में बिजली एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। नवजोत सिंह सिद्धू बिजली के मुद्दे पर अमरिंदर सिंह को घेरते रहे हैं। कैप्टन को दबाव में यह कहना पड़ा कि बिजली समझौतों को दोबारा से रिव्यू किया जाएगा। ऐसे में नए सीएम बन चरणजीत सिंह चन्नी को बिजली मुद्दे को हर हाल में हल करने का दबाव है। बिजली समझौतों को रद्द कर इसकी जांच करवाना व्हाइट पेपर भी जारी करना होगा।
बेअदबी मामले में जांच
पंजाब में कैप्टन अमरिंदर की कुर्सी जाने में गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी मामला भी अहम कारण बना है। बेअदबी मामले पर अभी तक कोई एक्शन नहीं हुआ है, जिसे लेकर कांग्रेस के तमाम नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह को घेरते रहे हैं। चरणजीत सिंह चन्नी सीएम बनते ही बेदअबी मामले को लेकर अपना नजरिया रखना होगा और आरोपियों को लेकर सख्त एक्शन लेना होगा। कोटकपूरा केस में जिस तरह से सरकार की फजीहत अदालत में हुई है और जांच अधिकारी कुंवर विजय प्रताप ने जो आरोप लगाकर कैप्टन अमरिंदर सिंह को कटघरे में खड़ा किया था, उन दाग को धोना भी चन्नी को ही होगा।
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सिख समुदाय के बीच यह एक अहम मुद्दा है, जिसे आप जबरदस्त तरीके से उठा रही है। इस मामले में अकाली दल पार्टी पूरी तरह से बैकफुट पर है और चन्नी को बेअदबी की घटनाओं में तत्काल एक्शन लेकर इंसाफ दिलाना बड़ी चुनौती होगी।
कांग्रेस के सामने 2022 की चुनौती
कांग्रेस पंजाब में नए चेहरे के साथ चुनाव मैदान में उतरेगी। इस बार कैप्टन अमरिंदर सिंह नहीं होंगे। अमरिंदर की जगह दलित नेता चरणजीत सिंह को मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपी गई है। ऐसे में उनके के कंधों पर कांग्रेस की सत्ता में वापसी कराना एक बड़ी चुनौती होगी। सत्ता वापसी के लिए कांग्रेस हाईकमान के 18 सूत्रीय कार्यक्रम को लागू करना भी होगा। सब कुछ चार माह में ही कर दिखाना होगा।
खेमों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती
पंजाब में कांग्रेस कई गुटों और खेमों के बीच बंटी हुई है। कैप्टन अमरिंदर सिंह, नवजोत सिंह सिद्धू, प्रताप सिंह बाजवा और शमशेर सिंह दूलो जैसे नेताओं के अपने-अपने खेमे हैं, जो एक दूसरे को पावर में नहीं देखना चाहते। अमरिंदर सिंह की कुर्सी भी इसी गुटबाजी के चलते गई है। पिछले साढ़े चार वर्षों से कांग्रेस को पंजाब में बाहरी चुनौती से कहीं ज्यादा पार्टी की आंतरिक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में चरणजीत सिंह चन्नी को सत्ता की कमान संभालने के साथ ही इन्हीं चुनौतियों का सामना करना होगा। अमरिंदर सिंह से लेकर सिद्धू और बाजवा तक के बीच संतुलन बनाना भी अहम चुनौती है।
जाट सिख के विश्वास को बनाए रखना
पंजाब की सियासत अभी तक जाट सिख के इर्द-गिर्द सिमटी रही है और उन्हीं का मुख्यमंत्री बनता रहा है। पंजाब में पहली बार कोई दलित सिख मुख्यमंत्री बना है। चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाकर कांग्रेस भले इसे मास्टर स्ट्रोक बता रही हो लेकिन यह जाट सिख नेताओं के गले से नहीं उतर रहा। जाटों का वोट बैंक 19 फीसदी है लेकिन यह कांग्रेस व अकाली दल का पक्का वोट बैंक है। बेशक दलितों की आबादी 32 फीसदी है लेकिन जाटों को साथ लेकर चलना भी चन्नी के लिए चुनौती है। हालांकि, कांग्रेस ने पंजाब में संगठन की कमान जाट सिख नवजोत सिंह सिद्धू को जरूर सौंप रखी है, ऐसे में चरणजीत सिंह चन्नी के सामने जाट सिख के विश्वास को जीतने की भी चुनौती होगी।
किसानों का विश्वास जीतना और केंद्र सरकार के साथ रिश्ते...
पंजाब की सियासत में किसान काफी अहम फैक्टर हैं। जहां केंद्र सरकार कृषि कानूनों को लेकर अडिग है वहीं पंजाब से ही किसानों का आंदोलन एक साल से जारी है। चरणजीत सिंह चन्नी के सामने किसानों के विश्वास को बनाए रखना और उन्हें अपने पक्ष में करना एक बड़ी चुनौती है। अकाली दल से लेकर आप तक किसानों को साधने में जुटी है। आप की तरफ से तो किसान नेता बलवीर सिंह राजेवाल से संपर्क साध उनको पार्टी का चेहरा तक बनाने की कोशिश जारी है। ऐसे में कांग्रेस के सामने भी किसानों को साधकर रखना होगा। इतना ही नहीं पंजाब सरहदी सूबा है और यहां पर आतंकवाद का साया मंडराता रहता है, ऐसे में केंद्र सरकार के साथ बेहतर तालमेल की जरूरत है।
सरहदी सूबा और नशे की तस्करी...
पिछले एक साल में सरहद से एक हजार किलो हेरोइन आ चुकी है और छह से अधिक बार पाक द्वारा ड्रोन से हथियार गिराए जा चुके हैं। ऐसे में पंजाब में आतंकवाद का साया लगातार मंडराता रहता है। पंजाब में हा ही में टिफिन बम की बरामदी हुई है और हिंदू नेताओं की हत्या के अलावा कई वीवीआईपी निशाने पर हैं। ऐसे में चन्नी को कानून व्यवस्था के अलावा आतंकवाद को दोबारा जिंदा न होने देना भी एक बड़ी चुनौती है।
सत्ता विरोधी लहर से निपटने की चुनौती
कैप्टन अमरिंदर सिंह की मुख्यमंत्री पद की कुर्सी इसी बात पर गई है कि पंजाब में उनके खिलाफ जबरदस्त एंटी-इंकम्बेंसी का माहौल था। अब सत्ता विरोधी लहर को कुंद करना चन्नी के लिए चुनौती होगी। पार्टी में कई नेताओं को लगता है कि अगर कैप्टन की अगुवाई में चुनाव हुआ तो उनका जीतना मुश्किल है। ऐसे में कैप्टन को कुर्सी से हटाकर उनकी जगह नए चेहरे को लाया गया है तो पार्टी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को कुंद किया जा सके। कांग्रेस ने इसी फॉर्मूले को अमलीजामा पहनाने के लिए कैप्टन की जगह चरणजीत सिंह चन्नी को सत्ता की कमान सौंपी है, लेकिन देखना है कि सत्ता विरोधी लहर से वे कैसे निपटते हैं।
क्षेत्रीय संतुलन साधने की चुनौती..
पंजाब की सियासत में बने रहने के लिए सिख और हिंदू समुदाय के बीच ही संतुलन बनाने के साथ क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना भी एक बड़ा चैलेंज है। पंजाब में मालवा, माझा, दोआबा क्षेत्रों में बंटा हुआ और हर इलाके में अलग-अलग जातीय समीकरण और नेताओं का सियासी वर्चस्व है। कांग्रेस के पास इस समय ऐसा कोई नेता नहीं है जो पंजाब के हर क्षेत्र में अपनी मजबूत पैठ साबित कर सके। यह रुतबा केवल कैप्टन अमरिंदर सिंह को ही हासिल था, लेकिन अब कांग्रेस ने उनकी जगह चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बना दिया है, जिनको माझा, मालवा व दोआबा में संतुलन बनाना होगा।
खनन व ड्रग माफिया और कांग्रेस विधायकों पर आरोप...
चन्नी को रेता माफिया पर पंजाब में नकेल कसनी होगी। 2017 में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने गुटका साहब की सौगंध खाकर कहा था कि वह ड्रग का सफाया कर देंगे। पंजाब में रेता बजरी की लूट को बेनकाब कर माफिया को अंदर कर दिया जाएगा लेकिन सत्ता प्राप्ति के बाद दोनों मुद्दे लटके हुए हैं। पंजाब में नशे की बिक्री में खादी दागदार हो चुकी है। डीजीपी से लेकर एसएसपी तक अधिकारी नशे के दाग से बच नहीं सके हैं। हाईकोर्ट में लंबित डीजीपी सिद्धार्थ चट्टोपाध्याय की रिपोर्ट खोलकर सार्वजनिक करना भी चुनौती है। साथ ही खनन के आरोप जिन नेताओं व कांग्रेसी विधायकों पर लग रहे हैं, उन पर शिकंजा कसना भी चुनौती है।
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