पर्दे के पीछे चल रही चर्चा
हालांकि, राजनीतिक हलकों में इस मुलाकात को दोनों दलों के बीच संभावित चुनावी तालमेल की दिशा में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। भाजपा भले ही सार्वजनिक रूप से पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी की बात कह रही हो लेकिन अकाली नेतृत्व और भाजपा के बीच बढ़ते संपर्क ने पर्दे के पीछे चल रही संभावित बातचीत को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
सूत्रों के मुताबिक यदि दोनों दल गठबंधन की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो सबसे बड़ी चुनौती सीटों के बंटवारे का फार्मूला तय करना होगी। अकाली-भाजपा गठजोड़ की संभावनाओं के पीछे सबसे महत्वपूर्ण आधार दोनों दलों का वोट गणित भी है।
2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल को करीब 18.38 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि भाजपा का वोट शेयर करीब 6.60 प्रतिशत रहा। दोनों को जोड़ने पर यह आंकड़ा करीब 25 प्रतिशत बैठता है। यानी अलग-अलग चुनाव लड़ने की स्थिति में बंटने वाला वोट अगर गठबंधन की स्थिति में एकजुट रहता है तो दोनों दल मिलकर एक महत्वपूर्ण चुनावी आधार तैयार कर सकते हैं। हालांकि केवल राज्यव्यापी वोट प्रतिशत को सीधे विधानसभा सीटों में तब्दील नहीं किया जा सकता।
25 प्रतिशत का संयुक्त वोट आधार महत्वपूर्ण
पंजाब में उम्मीदवार की पकड़, स्थानीय समीकरण, ग्रामीण-शहरी विभाजन, जातीय समीकरण और बूथ स्तर का संगठन भी चुनावी नतीजों पर बड़ा असर डालता है। इसके बावजूद करीब 25 प्रतिशत का संयुक्त वोट आधार दोनों दलों के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। खासकर ऐसे समय में जब 2027 का चुनाव बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अकाली दल और भाजपा की ताकत पंजाब में अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों में रही है।
अकाली दल का पारंपरिक आधार ग्रामीण पंजाब और सिख मतदाताओं के बीच रहा है, जबकि भाजपा का प्रभाव मुख्य रूप से शहरी क्षेत्रों और व्यापारी वर्ग समेत कुछ अन्य सामाजिक समूहों में रहा है। ऐसे में संभावित गठबंधन दोनों दलों के लिए एक-दूसरे की चुनावी ताकत का इस्तेमाल करने का रास्ता खोल सकता है। अकाली दल को शहरी क्षेत्रों में भाजपा के संगठन और प्रभाव का लाभ मिल सकता है, जबकि भाजपा को ग्रामीण क्षेत्रों में अकाली दल के पारंपरिक नेटवर्क और वोट आधार से फायदा मिलने की उम्मीद हो सकती है। यही वजह है कि संभावित गठबंधन को सिर्फ सीटों का समझौता नहीं बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक आधारों को जोड़ने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
2022 में लड़े थे अलग
2022 का विधानसभा चुनाव अकाली दल और भाजपा ने अलग-अलग लड़ा था। इससे पहले दोनों दल लंबे समय तक पंजाब में गठबंधन के साथी रहे। कृषि कानूनों और किसान आंदोलन के मुद्दे पर दोनों के बीच दूरी बढ़ी और गठबंधन टूट गया। अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं।
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार है, कांग्रेस भी मुख्य विपक्षी ताकत के रूप में मौजूद है और भाजपा लगातार राज्य में अपना आधार बढ़ाने की कोशिश कर रही है। दूसरी तरफ अकाली दल भी अपने पारंपरिक राजनीतिक प्रभाव को दोबारा मजबूत करने की कोशिश में है। ऐसे में दोनों दलों के लिए एक-दूसरे की जरूरत का राजनीतिक आकलन नए सिरे से किया जा रहा है।
सीट बंटवारा बनेगा सबसे बड़ी परीक्षा
अगर गठबंधन की बातचीत आगे बढ़ती है तो सबसे कठिन सवाल सीटों के बंटवारे का होगा। पुराने गठबंधन में भाजपा सीमित सीटों पर चुनाव लड़ती रही थी, जबकि अकाली दल बड़ी संख्या में सीटों पर मैदान में उतरता था। लेकिन अब भाजपा का दावा पहले की तुलना में काफी बड़ा है।
भाजपा पंजाब में अपने विस्तार को देखते हुए अधिक सीटों की मांग कर सकती है, जबकि अकाली दल अपने परंपरागत मजबूत क्षेत्रों को छोड़ने में आसानी महसूस नहीं करेगा। ऐसे में दोनों दलों के बीच सीटों का संतुलन तय करना गठबंधन की सबसे बड़ी परीक्षा होगी। 2022 में आम आदमी पार्टी को करीब 42.01 प्रतिशत वोट मिले और उसने 92 सीटें जीतीं।
कांग्रेस को करीब 22.98 प्रतिशत वोट मिले। इसके मुकाबले अकाली दल और भाजपा का संयुक्त वोट प्रतिशत करीब 25 प्रतिशत बैठता है। यही आंकड़ा संभावित गठबंधन को महत्वपूर्ण बनाता है। यदि दोनों दल अपने-अपने वोट आधार को एक-दूसरे में प्रभावी ढंग से स्थानांतरित करने में सफल रहते हैं तो 2027 में कई सीटों पर मुकाबले का गणित बदल सकता है। खासकर उन विधानसभा क्षेत्रों में जहां दोनों दलों का संयुक्त वोट पिछले चुनाव में जीतने वाले उम्मीदवारों के वोट के आसपास या उससे अधिक रहा हो।
हालांकि राजनीतिक गणित में वोट जोड़ना और वोट ट्रांसफर होना दो अलग बातें हैं। यही गठबंधन की सबसे बड़ी चुनौती भी होगी। भाजपा के मतदाता अकाली उम्मीदवार को और अकाली समर्थक भाजपा उम्मीदवार को कितनी सहजता से स्वीकार करते हैं, यह चुनावी नतीजों में निर्णायक साबित हो सकता है।
फिलहाल सुखबीर बादल और सी.आर. पाटिल की दिल्ली मुलाकात ने पंजाब की राजनीति में एक सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि 2027 में पुराने साथी एक बार फिर एक मंच पर दिखाई देंगे? गठबंधन हुआ तो यह केवल दो दलों का साथ आना नहीं होगा, बल्कि करीब 25 प्रतिशत के संयुक्त वोट आधार को एक चुनावी ताकत में बदलने की कोशिश होगी। अब नजरें सीटों के बंटवारे और दोनों दलों के अगले राजनीतिक कदम पर टिकी हैं।