पंजाब की हर दिक्कत व समस्या में बढ़ चढ़कर विदेश में आवाज बुलंद करने वाले पंजाबी एनआरआई इस बार पंजाब चुनाव से बिल्कुल दूर रहे। हालात यह कि पंजाब में 100 मत भी एनआरआई ने नहीं डाले, जबकि अकेले यूएस में पंजाबी एनआरआई की संख्या आठ लाख के आसपास है।
पंजाब का एनआरआई विदेश में आर्थिक रूप से मजबूत है। यही वजह है कि पंजाब चुनाव में राजनीतिक दलों को वित्तीय सहायता प्रदान कर और उन्हें वोट दिलाने में उनकी भूमिका काफी अहम रहती है। चुनाव में उपस्थिति दर्ज कराते हैं लेकिन मताधिकार का इस्तेमाल करने में ठंडे हो जाते हैं। साल 2022 का विधानसभा चुनाव पंजाब के इतिहास में पहला ऐसा चुनाव है, जिसमें एनआरआई ने अपनी उपस्थिति भी दर्ज नहीं करवाई और मतदान प्रतिशत भी काफी कम रहा है। साल 2022 में 1300 एनआरआई मतदाताओं ने अपना पंजीकरण करवाया था, मगर 100 से भी कम मत पड़े।
पंजाब में 2019 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ 393 विदेशी मतदाताओं ने अपना पंजीकरण कराया था, जिसमें 264 पुरुष और 129 महिलाएं थीं। 2014 के लोकसभा चुनावों में विदेशी मतदाताओं की संख्या 169 थी और कोई भी वोट डालने नहीं आया था। एनआरआई को 2010 के बाद मतदान का अधिकार दिया गया था।
कई दलों के एनआरआई विंग बने
कनाडा, अमेरिका, यूके और ऑस्ट्रेलिया में पंजाबी एनआरआई की बड़ी आबादी है। कनाडा में तो पंजाब चुनावों के दौरान पूरा जश्न का माहौल होता है, वहां पर भी तमाम राजनीतिक दल समांतर रूप से कनाडा में भी प्रचार करते हैं। बाकायदा ओवरसीज कांग्रेस से लेकर अकाली दल समेत तमाम राजनीतिक दलों के एनआरआई विंग बने हैं। 2017 के विधानसभा चुनाव में कई एनआरआई विभिन्न राजनीतिक दलों के समर्थन में पंजाब आए थे। राज्य के दोआबा क्षेत्र को राज्य की एनआरआई बेल्ट के रूप में जाना जाता है। हालांकि, राज्य के अन्य दो क्षेत्रों, माझा और मालवा में भी अब भारी संख्या में एनआरआई हैं।
पंजाबी बेशक वतन से दूर होता है लेकिन अपनी मिट्टी से जुड़ा रहता है। पिछले कई चुनावों में एनआरआई हताश व निराश हुआ है। यहां तो ऐसे एनआरआई हैं जो केवल राजनीतिक दलों को धन मुहैया करवाते हैं, बल्कि उन्हें वोट हासिल करने में भी बड़ी भूमिका निभाई है। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ है। मनजीत कौर संघा, एनआरआई