पंजाब के किसान एकजुट होकर अगर विधानसभा चुनाव के रण में उतरे तो पंजाब की सियासत की फिजा बदल सकती है। किसानों को चुनाव लड़ने के लिए एकजुट होकर चलना होगा लेकिन माहिरों का तर्क है कि यूनियनों की अलग अलग विचारधारा है। उगराहां व क्रांतिकारी गुट चुनाव से दूर रहता है, उगराहां की विचारधारा सीपीआई से जुड़ी हुई है।
किसान यूनियनों में सतनाम सिंह पन्नू, अध्यक्ष, किसान मजदूर संघर्ष समिति,भारती किसान यूनियन-एकता उग्रहा ,भारतीय किसान यूनियन क्रांतिकारी , क्रांतिकारी किसान यूनियन, भारतीय किसान यूनियन लखोवाल, भारतीय किसान यूनियन डकोंडा, भारतीय किसान यूनियन राजेवाल, भारतीय किसान यूनियन कादियां, किरती किसान यूनियन, भारतीय किसान यूनियन दोआब, किरती किसान यूनियन, जम्हूरी किसान यूनियन आदि प्रमुख हैं। मोर्चा फतेह करने के बाद किसान वापस आ रहे हैं और अब पूरे पंजाब की नजर इस पर है कि किसान आगे क्या करेंगे।
किसान नेता बलवंत सिंह का कहना है कि किसानों की विचारधारा अलग-अलग है। उगराहां व कई संगठन तो राजनीति से दूर हैं। बलवंत सिंह का कहना है कि अगर किसान यूनियन एकजुट होकर लड़ती है तो निश्चित तौर पर पंजाब फतेह होगा लेकिन यहां विचारधारा अलग अलग है। इसलिए किसान यूनियन एकजुट होकर चुनाव नहीं लड़ सकती हैं।
वहीं ड्रीमटेल की संचालक व एपीजे की पूर्व लेक्चरर नीति सोनी का कहना है कि किसानों को बदलाव लाना चाहिए। उनके लिए पूरे पंजाब ने आंदोलन किया है और पूरा साथ दिया है। किसानों को अब एकजुट होकर पंजाब की राजनीति में उतरना चाहिए। अगर किसान नेता बलवीर सिंह राजेवाल से लेकर डॉ. दर्शन पाल अगुवाई करते हैं तो पंजाब तरक्की की राह पर होगा।
राणा शेरगिल का कहना है कि पंजाब को किसानों ने बचाया है। किसानों को आगे आना चाहिए। इस अंदोलन ने कई नेता पैदा किए हैं, पंजाब ही नहीं देश की सियासत को देखना चाहिए कि तमाम नेता अंदोलन से निकलते हैं। किसानों ने जिस तरह से मिसाल कायम की है, उसकी मिसाल राजनीति में भी पैदा करने का वक्त है। यह भी तय है कि किसान अगर एकजुट होकर आगे आते हैं तो पंजाब में तेज हवा निकलेगी जो सबका सफाया करेगी।