करतारपुर से नाम जपो, किरत करो और वंड छको का फलसफा दिया था गुरु जी ने
जीवन के 17 साल बिताए श्री गुरु नानक देव जी ने, गुरु महाराज की समाधि व कब्र आज भी करतारपुर में मौजूद
अमर उजाला ब्यूरो
जालंधर। पहले गुरु श्री गुरुनानक ने रावी नदी के किनारे एक नगर बसाया और यहां खेती कर उन्होंने ‘नाम जपो, किरत करो और वंड छको’ (नाम जपें, मेहनत करें और बांट कर खाएं) का फलसफा दिया था। इतिहास साक्षी है कि श्री गुरु नानक देव की तरफ से भाई लहणा जी को गुरु गद्दी करतारपुर (पाकिस्तान) में सौंपी थी। जिन्हें दूसरे गुरु अंगद देव के नाम से जाना जाता है और आखिर में श्री गुरुनानक देव जी ने करतारपुर में ही समाधि ली थी। अब पाकिस्तान सरकार वहां पर कॉरिडोर बनाने का ऐलान कर रही है, जिससे निश्चित तौर पर एक नया इतिहास लिखा जाएगा। लाखों सिखों की 17 साल की लंबी अरदास के बाद श्री गुरु नानक देव जी के समाधि स्थल पर लाखों संगत का सैलाब उमड़ना तय है।
सुखदेव सिंह और अवतार सिंह बेदी जो गुरुनानक देव की सोलहवीं पीढ़ी के तौर पर गुरुद्वारा चोला साहिब डेरा बाबा नानक में सेवाएं निभा रहे हैं। उनका कहना है कि करतारपुर साहिब एक ऐसा स्थान है, जहां गुरुनानक देव ने अपने जीवन के 17 साल, पांच महीने और नौ दिन बिताए हैं और गुरु साहिब का पूरा परिवार का भी करतारपुर साहिब में आकर बस गया था। गुरु साहिब के माता-पिता का देहांत भी यहीं हुआ था। करतारपुर में ही श्री गुरु नानक देव जी ने 17 साल तक खेती करके काम करने, लंगर शुरू करवाकर मिलकर खाने तथा सिमरन के नाम जपने तथा सिखी उसूलों की उदाहरण पेश की थी। हिंदू तथा मुसलमानों के सांझे रहिबर के रूप में उनकी समाधि व कब्र वहां आज भी मौजूद है, जहां हर कौम के लोग चाहे वह हिंदू हो, सिख हो तथा मुसलमान, यहां नतमस्तक होना सौभाग्य समझता है। करतारपुर साहब का यह गुरुद्वारा भारत-पाकिस्तान की सरहद पर पाकिस्तान की तरफ है, जहां से डेरा बाबा नानक द्वारा सीधा लगातार जाने के प्रबंधन के लिए सिख संगत लंबे समय से प्रयासरत थी और वहां पर लगातार अरसाद की जा रही थी।
करतारपुर गुरुद्वारा साहब के बारे में इतिहास है कि जीवन के अंतिम दिनोरं में श्री गुरु नानक देव जी की ख्याति बहुत बढ़ गई स्वयं विरक्त होकर ये अपने परिवार वर्ग के साथ रहने लगे और दान पुण्य, भंडारा करने लगे। उन्होंने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो कि अब पाकिस्तान में है और एक बड़ी धर्मशाला उसमें बनवाई। इसी स्थान पर 22 सितंबर 1539 को श्री गुरुनानक देव जी महाराज ने अपना चोला छोड़ दिया। अब एक नया इतिहास लिखा जा रहा है और डेरा बाबा नानक से श्री करतापुर साहब का गुरुद्वारा सामने ही दिखाई देता है। सिख संगत बार्डर पर खड़े होकर श्री गुरु महाराज को अरदास करती नजर आई है। लेकिन अब बिना वीजा के रास्ता खुलने की घोषणा से निश्चित तौर पर सिख जगत में खासा उत्साह है।