साल 2000 में 5000 हजार औद्योगिक यूनिटें थीं, जो अब 50 ही रह गईं : इंद्र सेखड़ी
उद्योगपति इंद्र सेखड़ी ने बताया कि उद्योगों को खोखला करने में सरकारों की नीतियों का पूरा हाथ है। बटाला में 90 प्रतिशत यूनिटें बंद हो गईं हैं। सेखड़ी ने बताया कि जब बटाला का उद्योग 2000 में शिखर पर था, तब यहां 5000 यूनिटें थीं। आज लगभग 50 यूनिटें ही रह गई हैं। रिजर्व बैंक आफ इंडिया ने 2016 में एक नोटिफिकेशन जारी कर बैंकों को हिदायतें दी थीं कि कर्ज न वापस करने की सूरत में गिरवी रखी जायदाद की नीलामी सीधे तौर पर न की जाए और इसके लिए तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया जाए, जिसमें एक सदस्य पंजाब सरकार की ओर से नामजद होगा, दूसरा सदस्य बैंक का होगा और तीसरा एक इंडस्ट्रियल विशेषज्ञ होगा। मगर अभी तक ऐसी किसी भी कमेटी का गठन ही नहीं किया जा सका है।
करीब 22 साल हो गए हैं इस नोटिफिकेशन को, उन्होंने अभी तक इसका अस्तित्व ही नहीं देखा। ऐसी परिस्थितियों में यहां की इंडस्ट्री खत्म हो रही है। बटाला का उद्योग अब सरकार की बढ़िया औद्योगिक नीतियों से ही संभव है। बटाला की सिसकती इंडस्ट्री को भी अन्य राज्यों की तरह विशेष सहूलियतें दी जाएं, ताकि उद्योगपति अपने उद्योग को एक बार दोबारा चालू करने का प्रयत्न कर सके।
इंडस्ट्री की बदतर हालत का असर रोजगार पर कहर बनकर बरसा : गुरमीत सिंह बख्तपुरा
एक्टू (ऑल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियंस) के प्रादेशिक सह अध्यक्ष गुरमीत सिंह बख्तपुरा ने बताया कि बटाला की इंडस्ट्री की बदतर हालत का असर रोजगार पर कहर बनकर बरसा है। यहां की इंडस्ट्री में पांच तरह के मजदूर काम करते हैं, जिसमें मोल्डर मजदूर, बाल्टी मजदूर, वर्कशॉप मजदूर, कोयला मजदूर और डेली मजदूर शामिल हैं। बटाला कभी रोजगार का बड़ा हब था। अब स्थिति ऐसी बन गई है कि यहां इंडस्ट्री के खराब हालात के कारण इन मजदूरों को सिर्फ टोकन काम ही मिल रहा है, जबकि रेगुलर काम नहीं मिल रहा। 1991 के दौर में जब बटाला का उद्योग खुशहाल था तो उन दिनों कारखानों में मजदूर 3 शिफ्टों में रेगुलर दिन-रात काम करते थे।
इतना रोजगार था कि आसपास के गांव और यहां तक कि 40 किलोमीटर दूर गुरदासपुर से भी मजदूर बटाला काम करने आते थे। इंडस्ट्री खुशहाल स्तर पर थी तो एक माह में करीब 7 भट्ठियां चलती थीं। एक भट्ठी चलाने में 70 से 80 मजदूर काम करते थे। अब औद्योगिक मंदी के कारण आलम यह है कि हफ्ते में सिर्फ एक भट्ठी चलती है, जिसकी वजह से मजदूर को सिर्फ 15 दिन का काम ही मिल रहा है। बाकी 15 दिन का काम खत्म हो गया है। कारखानों में काम न मिलने से चौक चौराहों पर मजदूर दिहाड़ी के इंतजार में बैठे रहते हैं। कुछ की दिहाड़ी लग जाती है तो कुछ शाम को खाली हाथ घरों को चले जाते हैं। इसके अलावा बटाला की इंडस्ट्री पर आतंकवाद के दौर ने बुरा प्रभाव डाला है।
डर के कारण कई उद्योगपति अन्य राज्यों में पलायन कर गए, जिससे बटाला की बहुत सारी यूनिट बंद हो गईं। अगर हम बात 1990-91 की करें तो बटाला के औद्योगिक क्षेत्र में करीब 50,000 मजदूर काम करता था, लेकिन अब महज 15000 मजदूर को ही काम मिल रहा है। जो काम मिल रहा है वह भी नियमित नहीं है। सरकारों से उनकी अपील की है कि जैसे अन्य राज्यों को इंडस्ट्री के क्षेत्र में इन्सेंटिव दिए जाते हैं, वैसे इन्सेंटिव बटाला इंडस्ट्री को भी दिए जाएं। ताकि उद्योग पुनर्जीवित हो सके, जिससे लोगों को रोजगार मुहैया करवाया जा सके।