भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे और तीन तरफ से सतलुज नदी से घिरे गांव कालू वाला (टापू) के ग्रामीण हमेशा पाकिस्तान से भयभीत रहते हैं। सीमा पर तनावपूर्ण स्थिति बनते ही गांव छोड़कर सुरक्षित स्थान पर जाना पड़ता है। करीब 70 परिवारों के लिए यह गांव काला पानी से कम नहीं है। यहां की आबादी लगभग 450 है।
पिछले साढ़े सात दशक से शिक्षा से वंचित इस गांव में बहुत कम लोग 12वीं पास हैं। यहां न डिस्पेंसरी है न ही पीने के लिए शुद्ध पानी। बिजली है, लेकिन बारिश में बाढ़ आने पर बिजली गुल हो जाती है। तो एक से दो माह तक नहीं आती है।
नाव से ले जाते हैं धान से लदी ट्रालियां : ग्रामीण मक्खन सिंह कहते हैं कि बीएसएफ ने अस्थायी बलून पुल स्थापित किया है, जो छह माह ही रहता है। धान के सीजन में मुश्किलें होती हैं। धान से लदी ट्रालियां बड़ी नाव के जरिये मंडी ले जाने का प्रयास करते हैं तो कई बार नदी में ही डूब जाती हैं। सभी नेता कहते हैं कि उनके गांव में दरिया पर पुल बनावा देंगे, लेकिन पुल बनवाने का वादा आज तक किसी ने भी पूरा नहीं किया है।
जान जोखिम में डालकर स्कूल जाते हैं बच्चे
कालू वाला के साथ पाकिस्तान के तीन गांव मस्तेके, कलंजर व आकूवाड़ा लगते हैं। बच्चों को नाव में बैठकर रोजाना स्कूल जाना पड़ता है। बरसात के सीजन में दरिया उफान में होता है, ऐसी स्थिति में बच्चों की जान का खतरा बना रहता है। छात्र मलकीत सिंह ने बताया कि तमाम मुश्किलों का सामना कर प्लस-टू पास कर आगे की पढ़ाई कर रहा हूं। आज तक यहां से कोई भी व्यक्ति अधिकारी पद तक नहीं पहुंचा है। यहां के ग्रामीण व नौजवान ज्यादातर पढ़े-लिखे नहीं हैं।
बाढ़ आने पर भागना पड़ता है पाकिस्तान
यहां के लोग अपने खेतों की खातिर कई बार बर्बाद हुए हैं। बाढ़ भी इन्हें कई बार घर छोड़ने पर मजबूर कर चुकी है। वर्ष 1988 में आई बाढ़ से बहुत नुकसान हुआ था। गांव में करीब 15 फुट पानी भर गया था। यदि अचानक रात के समय बाढ़ आ जाए तो बचने के लिए पाकिस्तान सीमा पर भागना पड़ता है।
दूषित पानी से फैल रहा दांत व चर्म रोग
ग्रामीण चन्ना सिंह ने बताया कि गांव के लोग ट्यूबवेल का दूषित पानी पीने को मजबूर हैं, जिससे दंत व चर्म रोग फैल रहा है। डिस्पेंसरी नहीं है। इलाज के लिए शहर जाना पड़ता है। बारिश में गलियां कीचड़ से भर जाती हैं, बाइक तक नहीं चलती है। किसी के पास चार पहिया वाहन नहीं है।