कुछ दिन पहले तक मिसाइलों और ड्रोन हमलों के धमाकों से गूंज रहे पंजाब के सीमावर्ती जिलों के लोगों को नीति आयोग की बैठक से काफी उम्मीदें जगी हैं। इस बैठक में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इन जिलों में औद्योगिक विकास के लिए विशेष पैकेज की मांग की है। प्रधानमंत्री ने भी उन्हें भरोसा दिया है कि इस क्षेत्र के ढांचागत विकास के साथ यहां के औद्योगिक ढांचे को भी विकसित किया जाएगा।
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर चुके अमृतसर के सीमावर्ती गांव राणीयां के जोगिंदर सिंह अपने ही इलाके में रहते हुए कोई छोटा-मोटा औद्योगिक प्लांट लगाना चाहते हैं, लेकिन हालात ऐसे हैं कि उन्हें अपना यह सपना पूरा होता नहीं दिख रहा। कई अड़चनें हैं। पहले तो कोई निवेशक ही तैयार नहीं हो रहा। दूसरा, उद्योगों के लिए उचित माहौल व सुविधाएं नहीं हैं। वह कहते हैं कि यही कारण है कि युवाओं को दूसरे शहर या विदेश का रुख करना पड़ता है। हालांकि, उनको पूरी उम्मीद है कि हालात हमेशा ऐसे नहीं रहेंगे और यहां बड़ी इंडस्ट्री लगेगी।
सीमावर्ती जिले फाजिल्का के कस्बे जलालाबाद के राइस मिलर राजिंदर घीक बताते हैं कि 2014 के बाद राइस मिलिंग से जुड़ी 30 से 40 प्रतिशत इकाइयां बंद हो चुकी हैं। इस पुरानी इंडस्ट्री को बचाने की जरूरत है। यहां के लोग गेहूं और धान की फसल पर ही निर्भर हैं, इसलिए कृषि आधारित उद्योग लगाकर उन्हें रोजगार दिया जा सकता है। अभी तो राइस मिलिंग इंडस्ट्री के सामने बचे रहने की चुनौती है। पहले सरकार ने मार्केट फीस माफ की थी, लेकिन बाद में यह निर्णय वापस ले लिया। यूपी-एमपी में यह इंडस्ट्री बढ़ रही है। लाॅजिस्टिक्स में भी हमें सब्सिडी की जरूरत है। कच्चे माल की बड़ी समस्या है।
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पंजाब किसान सभा के प्रांतीय अध्यक्ष जलालाबाद के अशोक कंबोज के अनुसार, पहले तो हमारे यहां कई राइस शेलर थे। धीरे-धीरे सब खत्म हो गए। सभी पार्टियों ने बड़ी इंडस्ट्री लगाने का वादा किया, लेकिन पूरा नहीं किया। सरकार को गन्ना आधारित उद्योग को बल देना चाहिए। इससे किसान धान-गेहूं के चक्र से बाहर निकलेंगे और भूजल की भी बचत होगी। किसान तैयार हैं... बस सरकार के हाथ पकड़ने की देर है। इस इलाके को राइस हब के तौर पर भी विकसित किया जा सकता है।
जलालाबाद व्यापार मंडल के अध्यक्ष बब्बू डोडा कहते हैं- जंग हो या बाढ़... सबसे ज्यादा नुकसान हमें ही सहना पड़ता है। हम कई बार सांसद और विधायक के माध्यम से सरकार से मांग कर चुके हैं कि यहां कोई बड़ी इंडस्ट्री लगाई जाए। कोई बड़ा प्रोजेक्ट हो, जिसमें पांच-छह हजार लोगों को रोजगार मिल सके। फिर युवा बाहर नहीं जाएंगे। नशे से भी बचे रहेंगे, लेकिन हमारी मांग पर कोई असर नहीं हुआ। नीति आयोग की बैठक से उम्मीद जगी है।
अवैध खनन से परेशान
पठानकोट के बमियाल के रहने वाले किसान गुरमुख सिंह यहां हो रहे अवैध खनन से काफी परेशान हैं। कहते हैं कि इंडस्ट्री यहां है नहीं.. और खेती योग्य जमीन व जंगल पर अवैध खनन माफिया ने कहर बरपा रखा है। सरकार इस पर सख्ती करे। बड़ी इंडस्ट्री लगे तो रोजगार मिल सकता है। फिर युवा विदेश भी नहीं जाएंगे। जल्दी पैसे कमाने के लालच में कुछ युवा भटक कर नशा तस्करी के रास्ते पर चल पड़े हैं, उन्हें अच्छा रोजगार मिलेगा, तो गलत रास्ता छोड़ देंगे।
25 किलोमीटर का फिरोजपुर-पट्टी रेल लिंक प्रोजेक्ट 12 साल से अधूरा
वर्ष 2013 में केंद्रीय रेल मंत्रालय ने फिरोजपुर-पट्टी रेल लिंक प्रोजेक्ट को मंजूरी दी थी। यह 12 साल से अधूरा है। 25 किलोमीटर लंबे इस हिस्से के बनने से जम्मू से राजस्थान तक पूरी बॉर्डर बेल्ट रेल सुविधा से जुड़ जाएगी। व्यापार भी आसान हो जाएगा, लेकिन फंड की कमी और जमीन अधिग्रहण से जुड़ी समस्याओं के कारण यह परियोजना आगे नहीं बढ़ पाई। पंजाब सरकार परियोजना के लिए आवश्यक भूमि अधिग्रहण की सुविधा के अलावा लगभग 147 करोड़ रुपये का अनुदान जारी करने में विफल रही।
-फिरोजपुर-पट्टी रेल लिंक से फिरोजपुर और अमृतसर के बीच की दूरी भी कम हो जाएगी। यह पंजाब के मालवा और माझा क्षेत्रों को भी आपस में जोड़ेगा। इसके अलावा, यह जम्मू और मुंबई के बीच की दूरी को भी 267 किलोमीटर कम कर देगा।
-यह रेल लिंक श्रीनगर, अनंतनाग, उधमपुर, जम्मू, पठानकोट, गुरदासपुर, बटाला, अमृतसर, तरनतारन, पट्टी, फिरोजपुर, गुरुहरसहाय, जलालाबाद, फाजिल्का और अबोहर को श्री गंगानगर (राजस्थान) के माध्यम से मुंबई से जोड़ेगा जो अंततः जम्मू-कश्मीर, पंजाब और राजस्थान के संपूर्ण पिछड़े सीमा क्षेत्र के समग्र विकास को बढ़ावा देगा।
न कंटेनर यार्ड बना न रेल कोच फैक्टरी
फिरोजपुर रेलवे मंडल के अधीन फिरोजपुर जिले में कंटेनर यार्ड और रेल कोच फैक्टरी का निर्माण प्रस्तावित था, लेकिन ये दोनों प्रोजेक्ट सिरे नहीं चढ़ पाए। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और भूमि अधिग्रहण से जुड़े विवाद के कारण इस क्षेत्र से ये दो बड़ी परियोजनाएं छिन गईं। यहां के युवाओं को अब भी इंतजार है कि किसी दिन इस इलाके की तकदीर बदलेगी और उन्हें यहीं रोजगार मिल सकेगा।
एक समय था जब पूरे देश में गुरदासपुर की पहचान धारीवाल वूलन मिल की वजह से थी। यहां करीब 10 हजार कर्मचारी काम करते थे, लेकिन अब इस पर पूरी तरह ताला लग चुका है। यहां पंजाब ही नहीं, बल्कि हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, बिहार और यूपी के कर्मचारी भी काम करते थे।
अंग्रेजों के शासनकाल में वर्ष 1880 में अस्तित्व मेंं आई यह मिल सेना के लिए सामान बनाने के लिए भी प्रसिद्ध थी, लेकिन सरकार की गलत नीतियों के कारण इस पर ताला लग गया। वर्ष 2012 में मिले लगभग 100 करोड़ रुपये के फंड से यहां आधुनिक तकनीक की मशीनरी खरीदी गई, लेकिन ये मशीनरी मिल में ही बंद पड़ी है। समय के साथ-साथ इस मिल को कच्चा माल मिलना बंद हो गया। यहां के लिए कच्चा माल कानपुर से आता था। पूर्व भाजपा सांसद विनोद खन्ना ने वर्ष 2012 में मिल के लिए 50 करोड़़ रुपये का फंड जारी करवाया था, लेकिन इसका जीर्णोद्धार नहीं हो पाया।
तरनतारन में वन्यजीव पर्यटन को भुनाने की दरकार
सीमावर्ती जिले तरनतारन का हरिके वेटलैंड उत्तर भारत का सबसे बड़ा वेटलैंड है। यह ब्यास और सतलुज नदियों के संगम पर मानव निर्मित हरिके बैराज पर बनाया गया है। यहां वन्यजीव अभयारण्य भी है, जो अपने विविध पक्षी प्रजातियों और अन्य वन्यजीवों के लिए जाना जाता है। यहां लगभग 375 प्रजातियों के पक्षी व अन्य जीव हैं। दुनियाभर के पक्षी प्रेमियों के लिए यह शोध और वन्यजीव पर्यटन का बड़ा केंद्र हो सकता है।