सिदाना इंस्टीच्यूट ऑफ एजूकेशन की प्रिंसिपल डायरेक्टर डॉ. जीवन ज्योति सिदाना कहती हैं कि मौजूदा समय में जहां महिला उम्मीदवार घोषित होती हैं, वहां उनके पति और परिवार के अन्य लोग ही ज्यादा सक्रिय नजर आते हैं। महिला के जीतने के बाद भी वही स्थिति रहती है। क्योंकि पति या परिवार के अन्य सदस्य ही उनकी जगह पर काम करते हैं। वे मतदान करने से पहले वे उम्मीदवारों का मूल्यांकन अवश्य करेंगी। यह देखेंगी कि पिछले समय के दौरान कौन-कौन से नेता ने क्या-क्या वादे किए और जनता से किए कितने वादे पूरे किए। इसके कोई फर्क नहीं पड़ता कि उम्मीदवार पुरुष है या महिला।
गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में बिजनेस स्कूल यूएसबी की पूर्व चेयरपर्सन डॉ. जसवीन कौर संधू कहती हैं कि समाज की तरक्की के लिए महिलाओं का राजनीति में आगे बढ़कर काम करना बहुत जरुरी है। आज समानता का जमाना है तो महिलाओं को भी राजनीति में समान ही मौके दिए जाने चाहिए। यह जरुरी नहीं कि महिला उम्मीदवार ही बेहतर हों। पुरुष भी समाज के लिए ईमानदारी से काम करते हैं। उन्होंने महिला मतदाताओं से कहा कि मतदान के दिन वे अपना मत परिवार के दबाव में नहीं दें बल्कि अपनी सोच के मुताबिक ही करें।
डॉ. इंदू वर्मा ने बताया कि अक्सर पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा ईमानदारी और मेहनत से काम करती हैं। जब राजनीति में मौका मिले तो वहां भी समाज का विकास करने और बेहतर करने में ज्यादा मेहनत से काम कर बेहतर नतीजे लाएंगे। वे मतदान केंद्र में जाने से पहले उम्मीदवारों की पूरी जानकारी हासिल करेंगी। देखेंगी कि कौन सा उम्मीदवार कितनी बात जीता और उस दौरान उसने लोगों के लिए क्या-क्या किया। वे उसी उम्मीदवार को वोट देंगी जो देश और राज्य को आगे ले जाने में अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से निभाए।