जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज
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अकाल तख्त के जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित फिल्म 'सतलुज' को ओटीटी प्लेटफॉर्म से हटाए जाने की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को दबाने का प्रयास बताते हुए कहा कि यह असंवैधानिक और अन्यायपूर्ण कदम है।
गड़गज्ज ने कहा कि आज जब मानवाधिकारों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की बात की जाती है, ऐसे समय में भारत में सिख अल्पसंख्यकों पर हुए कथित अत्याचारों की सच्चाई को देश और दुनिया तक पहुंचने से रोकना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
उन्होंने कहा कि 1990 के दशक में जब सिख युवकों के कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ों और न्यायेतर हत्याओं के मामले सामने आए, तब मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा ने हजारों पीड़ितों के रिकॉर्ड जुटाकर इन मामलों को दुनिया के सामने रखा था।
उनके अनुसार, खालड़ा की कहानी मानवाधिकार उल्लंघन के सबसे गंभीर मामलों में से एक को उजागर करती है और यह साबित करती है कि सच को हमेशा के लिए दबाया नहीं जा सकता। जत्थेदार ने कहा कि यदि देश में विभिन्न समुदायों, विशेषकर बहुसंख्यक समुदाय पर हुए अत्याचारों को दिखाने वाली फिल्मों का प्रदर्शन हो सकता है, तो सिख समुदाय के उत्पीड़न पर आधारित फिल्म को रोकना उचित नहीं है। उन्होंने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि वह बड़े दिल का परिचय देते हुए खालड़ा द्वारा उजागर की गई सच्चाई को लोगों तक पहुंचने दे और 'सतलुज' के प्रदर्शन की अनुमति दें।
उन्होंने कहा कि सच से जितना भागने की कोशिश की जाएगी, वह उतनी ही ताकत से सामने आएगा। अपराध करने वाले हमेशा जवाबदेही से नहीं बच सकते। साथ ही उन्होंने जून 1984 के बाद के दशक में सिखों की हत्याओं और कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ों से जुड़े मामलों में गंभीरता से कार्रवाई कर सिख समुदाय को न्याय दिलाने की भी मांग की। गड़गज्ज ने कहा कि सिखों पर हुए अत्याचारों को दर्शाने वाली इस फिल्म को हटाए जाने से सिख समुदाय की भावनाएं आहत हुई हैं।