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नवरात्र पर इन सिद्धपीठों के दर्शन करने से पूरी होगी हर मुराद

Sun, 10 Apr 2016 11:36 AM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, देहरादून
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चंद्रबदनी मंदिर
शुक्रवार से नवरात्र शुरू हो रहे हैं। आपको बताते हैं देवभूमि उत्तराखंड के कुछ ऐसे ‌देवी मंदिरों के बारे में जिनके दर्शन करने मात्र से सारे कष्ठ दूर हो जाते हैं। चंद्रबदनी मंदिर में सती के धड़ की पूजा की जाती है, लेकिन श्रद्वालुओं को धड़ के दर्शन नहीं कराए जाते हैं। यह मंदिर समुद्र तल से 2,277 मीटर पर स्थित है। चंद्रबनी मंदिर देवप्रयाग से हिंडोलाखाल मोटर मार्ग पर लगभग 22 किमी और नरेंद्रनगर से 109 किमी. दूर है। नई टिहरी-टिपरी मोटर मार्ग से भी चंद्रबदनी पहुंचा जा सकता है। नैखरी में सड़क से पांच-छह सौ मीटर पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जा सकता है।
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मां सुरकंडा मंदिर
सुरकुट पर्वत पर स्थित मां सुरकंडा मंदिर में सती का सिर गिरा था, जिससे वहां सिर की पूजा की जाती है। नवरात्र पर यहां भव्य मेला आयोजित किया जाता है। जहां सैकड़ों लोग मन्नतें मांगने पहुंचते हैं। सुरकंडा मंदिर चंबा-मसूरी मोटर मार्ग पर समुद्र तल से 2757 मीटर पर स्थित है। सुरकंडा मंदिर ऋषिकेश से चंबा 60 किमी और वहां से मसूरी मार्ग पर 20 किमी सड़क की दूरी तय कर कद्दूखाल स्थित है। कद्दूखाल से दो किमी पैदल चलकर मंदिर तक पहुंचा जाता है।
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कुंजापुरी मंदिर
कुंजापुरी मंदिर में कुंज की पूजा की जाती है। मंदिर के गर्भ गृह में प्रतिमा नहीं हैं वहां एक गड्ढानुमा स्थल है। बताते हैं कि यह वही स्थान है जहां सती का कुंज (पैर) गिरा था। यहीं पर पूजा की जाती है, जबकि देवी की एक छोटी सी प्रतिमा एक कोने में रखी है। नरेंद्रनगर ब्लॉक में ऋषिकेश से 28 किमी दूरी तय कर पहुंचा जा सकता है।

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dhari devi
श्रीनगर गढ़वाल से 15 किमी. की दूर पर स्थित कलियासौड़ में मां धारी देवी मंदिर स्थित है। लोक मान्यताओं के अनुसार धारी देवी में स्थित काली माता की मूर्ति मूल रूप से कालीमठ में थी जो बाढ़ में बहकर यहां कलियासौड़ नामक स्थान पर रुक गई। मान्यता के अनुसार कुंजू नामक एक धुनार को स्वप्न में अपने को नदी से बाहर निकालने का आदेश दिया। माना जाता है कि काली का कमर से ऊपर का हिस्सा धारी व कमर से नीचे का हिस्सा कालीमठ में है।
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कंसमर्दनी मंदिर
गढ़वाल के श्रीनगर स्थित कंसमर्दनी मंदिर का निर्माण शंकराचार्य के आदेश पर किया गया था। पुराणों के अनुसार जब कंस ने महामाया को शिला पर पटका था तो वह इस स्थान पर स्थापित हो गई। यहां देवी को कंस के अहम को नाश करने वाली कंसमर्दनी के रूप में पूजा जाता है। नवरात्रों के दौरान यहां कन्याओं की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
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चुड़ामणि देवी मंदिर
हरिद्वार में चुड़ियाला गांव स्थित प्राचीन सिद्धपीठ चुड़ामणि देवी मंदिर में दूर दराज से भक्त आकर प्रसाद चढ़ाकर माता के दर्शन कर मन्नत मांगते हैं। मंदिर के बारे में मान्यता है कि माता सती के पिता राजा दक्ष प्रजापति द्वारा आयोजित यज्ञ में भगवान शिव शंकर को आमंत्रित न किए जाने से क्षुब्ध माता सती ने यज्ञ में कूदकर यज्ञ को विध्वंस कर दिया था। भगवान शिव जिस समय माता सती के मृत शरीर को उठाकर ले जा रहे थे, उसी समय माता सती का चुड़ा यहां घनघोर जंगल में गिर गया था। तभी से इसी स्थान पर माता की पिंडी स्थापित होने के साथ ही भव्य मंदिर का निर्माण किया गया।
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महिषमर्दिनी चंडिका मंदिर
गोपेश्वर स्थित महिषमर्दिनी चंडिका मंदिर में मान्यता है कि नवरात्र के दौरान मंदिर में पूजा अर्चना करने वाले भक्तों के सभी दुखों को दूर करते मनोकामनाएं पूर्ण करती है।
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अनसूया देवी मंदिर
अनसूया देवी मंदिर में देवी अनसूया ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं को अपनी कोख में जन्म दिया था। तब से माता अनसूया को पुत्रदायनी के रुप में पूजा जाता है। नि:संतान दंपति यहां पुत्र कामना हेतु पहुंचते हैं।
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