देश पर जान न्यौछावर करने वाले वीर सपूतों का जब भी नाम लिया जाता है, तो गाजीपुर के मरणोपरांत परमवीर चक्र विजेता शहीद वीर अब्दुल हमीद का नाम बरबस ही होठों पर चला आता है। वर्ष 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में उन्होंने दुश्मनों का खूब लोहा लिया था। इसके बाद 1965 में पाकिस्तान के साथ हुई जंग में अमरीका निर्मित अजेय पांच पैंटन टैंक को हथगोले से उड़ाने में शहीद होने वाले वीर अब्दुल हमीद की वीर गाथा उनकी विधवा रसूलन बीबी सुनाते सुनाते भावुक हो जाती हैं। आज पूरा देश इस वीर सपूत का 53वां शहादत दिवस मना रहा है। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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- फोटो : amar ujala
परमवीर चक्र विजेता शहीद वीर अब्दुल हमीद की पत्नी रसूलन बीबी ने दिल्ली में थल सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत के आवास पर उनसे मिल कर शहादत दिवस पर आने का निमंत्रण पत्र भेंट किया था। इसके अलावा प्रधानमंत्री को भी न्योता दिया गया था। बीते वर्ष थल सेना प्रमुख गाजीपुर पहुंचे थे लेकिन इस बार वो नहीं आ पाए। वीर अब्दुल हमीद के गांव धामुपुर में उनकी माटी को नमन करने देश की विभिन्न हस्तियां पहुंची है।
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वीर अब्दुल हमीद के गांव वालों के मुताबिक, वीर हमीद बचपन और किशोरावस्था में आम और बेर के फलों को पत्थर के एक वार में ही मारकर गिरा दिया करते थे। बकौल रसूलन बीबी सेना में भर्ती के बाद पहला युद्ध उन्होंने चीन से लड़ा और जंगल में भटक कर कई दिनों तक भूखे रहकर किसी तरह घर आए थे, जहां पत्ता तक खाना पड़ा था। इसके बाद वर्ष 1965 में पाकिस्तान युद्ध से पहले 10 दिन के लिए छुट्टी पर आए थे।
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रेडियो से सूचना मिली तो हड़बड़ी में जंग के मैदान में जाने को बेताब हो गए। घर वाले मना करते रह गए। जाते वक्त कई अपशगुन हुए, उनकी बेडिंग खुल गई, साइकिल पंक्चर हो गई लेकिन भोर में वह निकल ही गए। जिस जांबाजी से उन्होंने लड़ाई लड़ी वह सबको पता है। गांव वालों का कहना है कि ढेला मारने में निशानची परमवीर चक्र विजेता का वह हुनर हथगोले से पैंटन टैंक तोड़ने के काम आया। शहीद होने तक पाकिस्तानी पैंटन टैंक तोड़ने वाले शहीद को मरणोपरांत देश का सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र उनकी बेवा रसूलन बीबी को पूरे सम्मान के साथ दिया गया।
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बता दें कि गाजीपुर जिले के धामूपुर गांव में परमवीर चक्र विजेता हवलदार अब्दुल हमीद का जन्म एक गरीब परिवार उस्मान खां दर्जी के घर एक जुलाई 1933 को हुआ था। अब्दुल हमीद को बचपन से ही सेना में भर्ती होने का शौक था। गरीबी के कारण उन्होंने अपने पिता के काम में भी हाथ बंटाना शुरू कर दिया और दर्जी का काम भी सीख लिए। उन्हें खेल-कूद का भी शौक था। अब्दुल हमीद 22 दिसंबर 1954 को बनारस जाकर फौज में भर्ती हो गए।
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सन 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया। उस युद्ध में उनको भी अपनी वीरता दिखाने का मौका मिला। युद्ध के दौरान उनके तमाम साथी एक-एक कर धराशाई होते गए। यह सब अपनी आंखों के सामने देखकर भी उनका साहस कम नहीं हुआ। वह कंकरीली-पथरीली जमीन पर जंगल-झाड़ियों के बीच भूखे-प्यासे, बच-बचाकर चलते रहे और एक दिन तेजपुर नामक बस्ती में पहुंच गए। इस मोर्चे की बहादुरी ने उन्हें जवान अब्दुल हमीद की जगह लांस नायक अब्दुल हमीद बना दिया।
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Veer Abdul Hamid
- फोटो : अमर उजाला
12 मार्च 1962 के बाद उन्हें तीन वर्षों के अंदर ही नायक, हवलदार, कंपनी क्वार्टर मास्टर की उपाधि हासिल हो गई। सन् 1965 में जब पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण किया तो उस युद्ध में अब्दुल हमीद ने साहस का परिचय देते हुए चीनी निर्मित तीन पैटन टैंकों को नष्ट करते हुए अपने प्राणों को देश के लिए न्यौछावर करते भारत माता की गोद में सो गए। उनकी इस वीरता के लिए भारत सरकार ने उन्हें परमवीर चक्र सम्मान से नवाजा।
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Veer Abdul Hamid
- फोटो : अमर उजाला
अपने सेवा काल में उन्होंने कई सैन्य सम्मान प्राप्त किया था। अपने पिता उस्मान फारुखी के नक्शे कदम पर चलते हुए वीर अब्दुल हमीद ने अपनी वीरता की असाधारण मिसाल कायम करते हुए देश को गौरवान्वित किया था। जब 1965 में युद्ध शुरू होने के आसार बन रहे थे तो वह अपने घर गए थे, लेकिन उन्हें छुट्टी के बीच से वापस ड्यूटी पर आने का आदेश मिला।
धामूपुर शहीद पार्क में रखी वीर अब्दुल हमीद की आरसीएल गन ।
परिवारीजनों और शुभेच्छुओं के रोके जाने के बावजूद वह रुके नहीं। उनकी पत्नी रसूलन बीबी ने उस वाकए को याद करते हुए बताया कि रोकने की कोशिश के बाद उन्होंने मुस्कराते हुए कहा था कि देश के लिए उन्हें जाना ही होगा।