अगर एक ही स्थान पर बस हौले से कदम बढ़ाते ही कालीन की रंगत बदल जाए तो कैसा हो...। यह कल्पना साकार होते देखी जा सकती है पीएम के संसदीय क्षेत्र स्थित पं. दीनदयाल हस्तकला संकुल में। इसे ट्रेड फैसिलिटी के नाम से भी जाना जाता है। पीएम मोदी ने हाल में इसका उद्धाटन किया था। यहां जो भी आता है वह यहां की खूबसूरती देखकर अचरज में आ जाता है। जिस जिस ने इस संकुल को देखा है उसने इसे अद्भूत करार दिया है। आगे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें...
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पं. दीनदयाल हस्तकला संकुल
- फोटो : अमर उजाला
पं. दीनदयाल हस्तकला संकुल के संग्रहालय में भदोही की कालीन की खूबियों के बारे में जिज्ञासुओं को जानकारी देने के लिए डिजिटल सेगमेंट बनाया गया है। भदोही और आस-पास के इलाकों में बनने वाली कालीन के निर्यात को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तकनीक के सहारे उसे नए अंदाज में आयातकों के सामने प्रस्तुत करने का उम्दा इंतजाम यहां कालीन की डिजिटल लाइब्रेरी में किया गया है। हॉल के ऊपर फाल्स सीलिंग में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर तीन प्रोजेक्टर लगाए गए हैं।
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पं. दीनदयाल हस्तकला संकुल
- फोटो : अमर उजाला
प्रोजेक्टर के जरिए फर्श पर कालीन की आकृति बनाई जाती है। ऐसा लगता है जैसे तीन कालीनें फर्श पर बिछी हों। जैसे ही कोई व्यक्ति इन कालीनों पर चलता है, प्रोजेक्टर के समीप लगे सेंसर से कालीन की डिजाइन बदलती जाती है। यहां दीवारों पर वास्तविक कालीनें भी प्रदर्शित हैं। इसका मकसद खरीदारों और सैलानियों को एक ही स्थान पर कालीन की सैकड़ों वेराइटी और खूबसूरती कम समय में एक साथ दिखाना है।
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पं. दीनदयाल हस्तकला संकुल
- फोटो : अमर उजाला
संकुल के इंटीरियर का काम करने वाली संस्था पवेलियन एंड इंटीरियर्स के निदेशक मैथ्यूज बेंजामिन ने बताया कि भदोही के कालीन निर्यातकों द्वारा निर्मित लगभग 100 से ज्यादा सर्वश्रेष्ठ कालीनों की हाई रिजोल्यूशन कैमरे से फोटो ली गई। उन तस्वीरों को थ्रीडी सॉफ्टवेयर से डेवलप किया गया और फिर उनकी लाइब्रेरी बनाई गई।
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पं. दीनदयाल हस्तकला संकुल
- फोटो : अमर उजाला
फारस के अब्बासी राजवंश (1528-1629 ई.) के सैनिकों ने उस दौर में हमला किया और मिर्जापुर-भदोही से गुजर रहे एक कारवां को लूट लिया। इस कारवां में यहां का बाशिंदा लुकमान हाकिम नामक कालीन बुनकर भी था। उसने भागकर पास के गांव में शरण ली। शरण देने के आभार स्वरूप उसने गांववालों को यह कला सिखाई।
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पं. दीनदयाल हस्तकला संकुल
- फोटो : अमर उजाला
समय के साथ-साथ बुनकरी की इस कला ने यहां अपनी जड़ें जमाईं। भदोही में कालीन बुनने की प्रथा 400 साल पुरानी है। अबुल फजल ने भी ‘आईना-ए-अकबरी’ में इलाहाबाद और जौनपुर में कालीन बुनाई की चर्चा की है। दीनदयाल हस्तकला संकुल में एक दिसंबर से ‘वूल प्रदर्शनी’ का आयोजन किया जाएगा।
दस दिनों तक चलने वाली इस प्रदर्शनी में विभिन्न क्षेत्रों के प्रचलित ऊनी कपड़ों के स्टॉल लगेंगे। 18 नवंबर से शिल्प मेला लगाने की योजना अंतिम रूप नहीं ले पाई है। सूत्रों की मानें तो कुछ कारणों से फिलहाल इसे स्थगित कर दिया गया है।