देश-दुनिया में सर्वविद्या की राजधानी के रूप में विख्यात काशी में एक ऐसा ‘गुरुकुल’ भी है जो आधुनिकता की आबोहवा के बीच वैदिक युगीन शिक्षा और गुरु-शिष्य परंपरा की मिसाल है। करीब 40 साल पहले स्थापित इस केंद्र में वर्तमान देश के विभिन्न राज्यों के अलावा नेपाल, रूस जैसे देशों की 150 से अधिक छात्राएं शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। आगे की स्लाइड्स में जानिए इस ‘गुरुकुल’ को...
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Panini Kanya Maha Vidyalay
- फोटो : amar ujala
महमूरगंज स्थित पाणिनी कन्या महाविद्यालय में शिक्षा के साथ ही छात्राएं सुयोग्य गुरु के सानिध्य में दीक्षा भी लेती हैं। ये छात्राएं यज्ञोपवीत धारण करती हैं और प्रतिदिन आचार्या के कुशल निर्देशन में शास्त्र के साथ ही शस्त्र चलाकर आत्मरक्षा का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। इन्हें प्रथमा, मध्यमा से लेकर शास्त्री आचार्य तक की शिक्षा दी जाती है।
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छात्राओं को वेदों के सस्वर पाठ, शास्त्रीय गायन के साथ ही लाठी, तलवार, भाला, जूडो, धनुष विद्या का भी आदि का नियमित अभ्यास कराया जाता है। खासियत यह है कि यहां सिर्फ छात्राओं का ही प्रवेश लिया जाता है और विद्वान वेदपाठी महिलाएं ही उनकी गुरु होती हैं। साल में कुछ महत्वपूर्ण अवसरों पर ही उन्हें परिवारीजनों से मुलाकात का मौका मिल पाता है।
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पाणिनी कन्या महाविद्यालय में रह कर अध्ययन करने वाली छात्राओं की दिनचर्या भोर में चार बजे से शुरू हो जाती है। 4:30 बजे सामूहिक मंत्रपाठ, 6:30 बजे हवन-पूजन, 7:30 बजे योगासन, नौ से दोपहर 12 बजे और दो से शाम पांच बजे तक कक्षाएं चलती हैं। इसके बाद शाम को 6:30 से 7:30 बजे तक हवन-पूजन, 7.30 बजे से आठ बजे तक सांस्कृतिक पूजन और फिर रात 10 बजे तक शयन।
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इस गुरुकुल का प्रचार्या डॉ. नंदिता शास्त्री कहती हैं कि शिक्षा प्रणाली में गुरु-शिष्य सानिध्य गुरुकुल में रहकर ही हो सकता है। शिष्य का यह दायित्व है कि वह आचार्य के बताए मार्ग का अनुसरण करे। इस समय शिक्षा के अधिकांश केंद्र अर्थ प्रधान हो गए हैं। ऐसे में वहां विद्या दायित्व का बोध कम ही दिखता है। शिक्षकों की जिम्मेदारी है कि वह दायित्वों का सजगता पूर्वक निर्वहन करें।
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नेपाल की छात्रा प्रशंसा आर्या कहती है कि जीवन में गुरु का स्थान सर्वोपरि होता है। ऐसा नहीं है कि बस केवल एक दिन शिक्षक दिवस के दिन ही गुरु का सम्मान किया जाए। इस गुरुकुल में गुरु-शिष्य का जो भाव है, वह कहीं नहीं मिलने वाला है।