वाराणसी के महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में आयोजित दो दिवसीय पर्यावरण कुंभ का समापन हो गया। इस वैचारिक कुंभ के उद्घाटन या समापन सत्र में भले ही मुख्यमंत्री न पहुंचे हों लेकिन दोनों दिन यहां भीड़ उमड़ी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की योजना के मुताबिक पांच वैचारिक कुंभों की योजना के तहत काशी में आयोजित पर्यावरण कुंभ में ऐसी कई सारी चीजें हुईं जिसे याद रखा जाएगा। आगे की स्लाइड्स में देखें..
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- फोटो : अमर उजाला
पर्यावरण कुंभ में पर्यावरणविदों ने उपभोक्तावाद से सामने आने वाली कठिनाइयों का जिक्र किया और भविष्य सुरक्षित करने के उपाय सुझाए। इस पर्यावरण कुंभ में पर्यावरण की चुनौतियों, उसके संरक्षण पर गहन चिंतन मनन किया। विकास के अंधाधुंध दौड़ती भागती जिंदगी के कारण संकट में इस प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों को पुन:संरक्षित करने के लिए एक बार फिर से भारतीय दर्शन, धर्म की ओर लौटने का आह्वान किया गया। कुंभ में आए वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों ने कई पहलुओं पर चिंतन मनन किया तो पर्यावरण के लिए कार्य करने वाले समाजसेवियाें, सामाजिक संस्थाओं ने लोगाें को प्रेरित करने का काम किया।
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दो दिवसीय पर्यावरण कुंभ में एक खास विचारधारा से जुड़े वक्ता ही दिखाई पड़े। पर्यावरण कुंभ के दौरान इसकी चर्चा रही कि आयोजन से स्थानीय और प्रतिष्ठित पर्यावरणविदों को विचार व्यक्त करने के लिए नहीं बुलाया गया। उद्घाटन समारोह में उपमुख्यमंत्री डॉ. दिनेश शर्मा पहुंचे तो वहीं समापन सत्र में प्रदेश के वन एवं पर्यावरण मंत्री दारा सिंह चौहान ने शिरकत की। इस पर्यावरण कुंभ में देश भर से आए करीब दो हजार पर्यावरणविद व वैज्ञानिकों ने शिरकत की।
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पर्यावरण कुंभ में सबसे खास बात रही यहां लगी प्रदर्शनी। विद्यापीठ के खेल मैदान में पर्यावरण कुंभ के लिए जर्मन हैंगर तकनीक से बने पंडालों में पर्यावरण संरक्षण और रक्षा के लिए चित्रों की प्रदर्शनी के साथ स्टॉलों को जगह दी गई। छात्र-छात्राओं के बीच रेत से बने समुद्रमंथन और प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उकेरी गई आकृति यहां आए हुए लोगों को अपने मोहपाश में खींचती रही। कुंभ में आये युवा पर्यावरणविदों के साथ छात्र-छात्राएं पूरे दिन यहां और भव्य पंडाल की सेल्फी लेते देखे गए।
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महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ में लगे पर्यावरण कुंभ के तहत प्रदर्शनी में दूसरे दिन कठपुतली शो मुख्य आकर्षण का केंद्र रहा। लखनऊ से आई टीम ने कठपुतली के माध्यम से बेहतरीन ढंग से पर्यावरण के महत्व को समझाया। नृत्य, संगीत, हास्य के समन्वय के इस कठपुतली शो में कलाकारों ने लोगों को संदेश दिया कि छोटे-छोटे प्रयासों से हम सब पर्यावरण के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। प्राकृतिक संपदा को अपनी थाती बनाए रख सकते हैं।
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इसी क्रम में पर्यावरण पर डॉक्यूमेंट्री देखने के लिए भी लोगों की जबरदस्त भीड़ उमड़ी। दूसरे दिन प्रदर्शनी में आम जनता को भी प्रवेश मिला, ऐसे में आम जनता ने भी प्रदर्शनी का पूरा आनंद उठाया। पेंटिंग और फोटो प्रदर्शनी ने उन्हें खासा आकर्षित किया। ललित कला विभाग की करीब सौ से अधिक पेंटिंग्स और देश भर से आए छायाचित्रों को देखने के लिए लोगों की भीड़ लगी रही। कुंभ में आये युवा पर्यावरणविदों के साथ छात्र-छात्राएं पूरे दिन यहां और भव्य पंडाल की सेल्फी लेते देखे गये।
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पर्यावरण कुंभ में लगी प्रदर्शनी में सोलर ट्री और सौर ऊर्जा से संचालित वाटर प्यूरिफायर आकर्षण का केंद्र रहा। सीएसआईआर के वैज्ञानिकों द्वारा बनाया ये सोलर ट्री कम जगह में ज्यादा सौर ऊर्जा पैदा कर सकता है। वहीं वाटर प्यूरीफायर की खासियत ये है कि इसमें सौ फीसदी पानी की बचत होती है। पानी के मिनरल्स नष्ट नहीं होते। इसकी कीमत पांच से छह हजार रुपये है। सरसों के तेल में आर्जीमोन की मिलावट, दूध में यूरिया, बोरिक एसिड और डिटर्जेंट की मिलावट की जांच करने वाली किट भी प्रदर्शनी में खास रही।
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प्रदर्शनी को पेंटिंग और छायाचित्रों ने अलग रंग दिया। कई थीम पर बनीं पेेंटिंग हर किसी को आकर्षित कर रही थीं। ललित कला विभाग और देश भर के कलाकारों की पेंटिंग में पर्यावरण के मर्म को बेहतर ढंग से समझाया गया। इसी तरह छायाचित्र प्रतियोगिता के लिए देश भर से आए 300 छायाचित्रों में से चुनिंदा 50 छायाचित्र भी इस प्रदर्शनी का हिस्सा बनें। नेचर और वाइल्ड लाइफ की थीम पर छायाचित्र प्रदर्शनी लगाई गई थी। इसमें अमर उजाला के फोटो पत्रकार जावेद अली की भी फोटो शामिल रहे।
प्रदर्शनी में एसओएस हरमन माइनर के बच्चों ने अपने मॉडल प्रदर्शित किए। कक्षा नौ के आयुष सिंह और करण यादव ने जासूसी बोट बनाई थी। साढ़े पांच हजार की लागत से बनी इस नाव में कैमरा है जो लाइव वीडियो के साथ वायस भी शेयर कर सकता है। कक्षा आठ के अनिकेत कुमार और नितिन त्रिपाठी ने जासूसी टैंक बनाया था। ये भूकंप या लैंड स्लाइड होने पर लोग कैसे और कहां फंसे हैं, इसकी लोकेशन देेगा। आठ हजार की लागत से तैयार इस स्पाई टैंक को गार्जियन टैंक का नाम दिया है।