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बनारस में इस तरह से किशोर और किशोरी जहर के हो रही आदी, पुलिस-प्रशासन मौन

Mon, 03 Feb 2020 03:51 PM IST
गीतार्जुन गौतम पुष्पेन्द्र कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
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हुक्का बार में युवक और युवतियां(सांकेतिक तस्वीर)। - फोटो : अमर उजाला
वाराणसी में जगह-जगह कुकुरमुत्ते की तरह खुले हुक्का बार शहर के रईसजादों के साथ ही आम परिवारों के लड़कों को भी नशे का आदी बना रहे हैं। शिकायत करने पर पुलिस कहती है कि हमें कार्रवाई का कोई अधिकार नहीं है। वहीं, जिला प्रशासन इस संबंध में पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए है।
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शहर के सिगरा, भेलूपुर, लंका, लक्सा, कैंट, सारनाथ और कोतवाली थाना क्षेत्र में कई जगह हुक्का बार धड़ल्ले से संचालित हो रहे हैं। इन हुक्का बार में सुबह से देर शाम तक कभी भी जाने पर 12 से 16 साल तक के किशोर और किशोरियां लाल-लाल आंखों के साथ नशे में झूमते हुए दिख जाते हैं। हुक्का बार में औसतन एक किशोर को 500 से 800 रुपये खर्च करना पड़ता है।
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इसके बाद वह अपनी सुधबुध खोकर घंटों वहीं बैठे रहते हैं। इस संबंध में एसएसपी वाराणसी प्रभाकर चौधरी से जब 'अमर उजाला' के संवाददाता ने पूछा तो उन्होंने कहा कि ऐसी जगहों पर पुलिस को सीधे छापा मारने का अधिकार नहीं है। एक-दो जगह पुलिस ने छापा मारा तो शिकायत अदालत में की गई।

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हुक्का बार संचालकों ने अदालत में दलील दी कि वह कुछ गलत नहीं करते हैं और नशे की कोई सामग्री नहीं बेचते हैं। जिला प्रशासन इस संबंध में मजिस्ट्रेट की टीम गठित कर कार्रवाई करे। पुलिस और प्रशासन एक-दूसरे पर जिम्मेदारी मढ़ कर खुद को बचाते रहें, लेकिन नुकसान शहर के किशोरों का हो रहा है। वह किसी भी तरह से 500 रुपये का जुगाड़ कर नशे के आदी होते जा रहे हैं और जिम्मेदार चुप्पी साधे हुए हैं।
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हम पैसा देते हैं तो डरे क्यों, दिक्कत होगी तो कोर्ट में घसीटेंगे
सिगरा थाना क्षेत्र के एक हुक्का बार संचालक से 'अमर उजाला' के संवाददाता ने पूछा कि आप खुलेआम हुक्का बार संचालित कर रहे हैं। आपको डर नहीं लगता है क्या...? इस पर उसका कहना था कि थानेदार, चौकी इंचार्ज और कारखास सबको तो पैसा दे रहे हैं। इसके बाद भी वह छापा मारेंगे तो कैसे साबित कर पाएंगे कि हम नशे की सामग्री बेंच रहे हैं। इसमें बहुत दांव-पेंच है।
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आप आए हैं तो आनंद लेकर जाइए और इन सब चक्करों में न पड़ें। पुलिस आएगी तो उसे देखना हमारा काम है। आप पूछ ही रहे हैं तो एक बात बता दे रहा हूं। सिगरा क्षेत्र के ही एक हुक्का बार का मामला अदालत तक गया था। पुलिस की बहुत खिंचाई हुई, तब से कोई कार्रवाई करने की नहीं सोचता है। बाकी, हम हर माह उनका खर्चा दे ही देते हैं। वह भी जानते हैं कि छापा मारेंगे तो कई तरह की कानूनी पेचीदगियों का उनको सामना करना होगा। इसलिए वह भी शांत रहते हैं और हम भी अपना धंधा कर रहे हैं।
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