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लोकसभा चुनाव 2019 : सुभासपा के तेवर भाजपा के लिए चुनौती, अलग होने के बाद बदल सकते हैं चुनावी नतीजे

Wed, 17 Apr 2019 01:28 PM IST
Sayali Maurya शशांक मिश्र,अमर उजाला,वाराणसी
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ओम प्रकाश राजभर (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी ने भाजपा से अलग होने के बाद 39 सीटों पर अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए। जिससे पूर्वांचल की कई सीटों के समीकरण ही नहीं बदलेंगे, नतीजे भी प्रभावित हो सकते हैं। कारण, सुभासपा 2012 के विधानसभा चुनाव में पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई सीटों पर 18 से 40 हजार मत हासिल कर चुकी है। सुभासपा प्रत्याशियों के घोषणा के बाद भाजपा ने नफा नुकसान का आंकलन शुरू कर दिया है। पढ़ें आगे की स्लाइड्स में...
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मुख्तार अंसारी (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
पूर्वांचल में भाजपा के लिए अपना दल (एस) के बाद सुभासपा का महत्व है। 2014 और 2017 में अपना दल के साथ मिलकर भाजपा ने पूर्वांचल में बड़ी जीत हासिल की थी। 2017 के विधानसभा चनाव से पहले सुभासपा के साथ भाजपा का गठबंधन हो गया था। इससे पहले सुभासपा मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी। 
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वाराणसी सहित कई सीटों पर राजभर समाज का बड़ा वोट बैंक है। 2012 में सुभासपा ने बलिया, गाजीपुर, मऊ और वाराणसी में प्रत्याशी उतारे थे। पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर ने गाजीपुर की जहूराबाद सीट पर 49 हजार 600 वोट पाए। इसके अलावा बलिया के फेफना में 42 हजार, रसड़ा में 26 हजार, सिकंदरपुर में 4 हजार, बेल्थरा रोड में पार्टी प्रत्याशी को 38 हजार वोट मिले थे। गाजीपुर, आजमगढ़, और वाराणसी में भी पार्टी उम्मीदवारों को 15 से 20 हजार मत मिले थे। 

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कैलाश सोनकर (फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला
2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने समझौते के तहत सुभासपा को आठ सीटें दी थीं। चार सीटों पर सुभासपा जीती। 2017 में ओम प्रकाश राजभर दोबारा जहूराबाद से चुनाव लड़े और 86 हजार 583 वोट पाकर जीते। इनके साथ वाराणसी से अजगरा से कैलाश सोनकर, गाजीपुर के जखनिया से त्रिवेणी राम और रामकोला से रामानंद बौद्ध को भी जीत मिली थी।
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ओम प्रकाश राजभर लोकसभा चुनाव में घोसी के साथ ही चंदौली सीट मांग रहे थे। भाजपा ने सीटों पर बात तो नहीं की, मगर सुभासपा के अरविंद राजभर को लघु उद्योग और अजीत प्रताप सिंह को बीज प्रमाणीकरण निगम में अहम जिम्मेदारी सौंपने के साथ ही सात अन्य को अलग-अलग आयोग में सदस्य बना दिया गया। इसके बाद भाजपा ने अपने चिन्ह (कमल) पर उन्हें घोसी से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव दिया मगर वह सुभासपा के चिन्ह (पीला ध्वज और छड़ी) पर चुनाव लड़ने के लिए अड़ गए। जिसके बाद सुभासपा भाजपा से अलग हो गई।
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