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जयंती विशेष: वाराणसी में हुआ था इस मणिकर्णिका का जन्म, स्वतंत्रता संग्राम की थीं पहली वीरांगना

Mon, 19 Nov 2018 10:16 AM IST
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
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laxmi bai - फोटो : अमर उजाला
कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान की रानी लक्ष्मीबाई के पराक्रम पर लिखी कविता 'खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी' सभी ने जरूर सुनी होगी। आज इसी वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई का जन्म दिवस है। रानी लक्ष्मीबाई का जन्म वाराणसी जिले के भदैनी में 19 नवंबर 1835 को हुआ था। वे बचपन से ही प्रतिभा की धनी थीं। आज उनकी जंयती के मौके पर बनारस में  विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन होगा। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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varanasi - फोटो : अमर उजाला

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की संघर्ष गाथा उनके जन्म स्थान काशी से ही प्रारंभ होती है। भदैनी स्थित रानी लक्ष्मी बाई स्मारक स्थल पर वीरांगना लक्ष्मी बाई की आदमकद प्रतिमा स्थापित है। इसमें वह घोड़े पर सवार, पीठ पर अपने बच्चे को बांधे और हाथ में तलवार लिए युद्ध की मुद्रा में हैं। स्मारक की दीवारों पर सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता बुंदेले हर बोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी... लिखी गई हैं। 
 
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रानी लक्ष्मी बाई का जन्म स्मारक - फोटो : self

अंग्रेजों के खिलाफ आजादी का नारा बुलंद करने वाली रानी लक्ष्मीबाई संभवतः भारतीय स्वंतत्रता संग्राम की पहली वीरांगना थी।  लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। इनके बचपन का नाम मणिकर्णिका था लेकिन प्यार से इन्हें मनु बुलाते थे। इनकी माता का नाम भागीरथी बाई तथा पिता का नाम मोरोपंत तांबे था। मोरोपंत एक मराठी थे और मराठा बाजीराव की सेवा में थे। 
 

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रानी लक्ष्मीबाई - फोटो : SELF


मनु जब चार वर्ष की थीं तब उनके मां की मृत्यु हो गई। घर में मनु की देखभाल के लिए कोई नहीं था इसलिए पिता ने उन्हें अपने साथ बाजीराव के दरबार में ले गए। बाजीराव के दरबार में मनु ने अपने चंचल ओर सुंदर स्वभाव से सबका मन मोह लिया। विवाह के बाद इनका नाम लक्ष्मीबाई रखा गया। 1851 में रानी लक्ष्मीबाई ने एक पुत्र को जन्म दिया पर लेकिन चार महीने की उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गई। 
 
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jhansi-ki-rani

सन 1853 में राजा गंगाधर राव की तबीयत बहुत ज्यादा खराब होने के कारण उन्हें दत्तक पुत्र लेने की सलाह दी गई। पुत्र गोद लेने के बाद कुइ दिनों बाद ही राजा गंगाधर राव की मृत्यु हो गई। दत्तक पुत्र का नाम दामोदर राव रखा गया। लोग उन्हें प्यार से 'छबीली' बुलाते। 1842 में इनका विवाह झांसी के राजा गंगाधर राव निवालकर के साथ हुआ, और ये झांसी की रानी बनीं। 

 
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1857 के सितंबर-अक्तूबर महीने में पड़ोसी राज्य ओरछा तथा दतिया के राजाओं ने झांसी पर आक्रमण कर दिया। रानी ने सफलतापूर्वक इसे विफल कर दिया।1858 के जनवरी माह में ब्रितानी सेना ने झांसी की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और मार्च के महीने में शहर को घेर लिया। दो हफ्तों की लडा़ई के बाद ब्रितानी सेना ने शहर पर कब्जा कर लिया। हालांकि रानी, दामोदर राव के साथ अंग्रेजों से बच कर भागने में सफल हो गई। रानी झांसी से भाग कर कालपी पहुंची और तात्या टोपे से मिली।
 
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laxmi bai - फोटो : अमर उजाला
तात्या टोपे और रानी की संयुक्त सेनाओं ने ग्वालियर के विद्रोही सैनिकों की मदद से ग्वालियर के एक किले पर कब्जा कर लिया। 17 जून 1858 को ग्वालियर के पास कोटा-की-सराय में ब्रिटिश सेना से लड़ते-लड़ते रानी लक्ष्मीबाई की मौत हो गई।
 
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