वाराणसी में स्थित अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (ईरी) का शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकार्पण करेंगे। ईरी कम सिंचाई में बेहतर पैदावार वाले धान की प्रजातियों को विकसित करेगा। उत्तर प्रदेश सहित देश भर के किसानों को मौसम की मार से बचाने के लिए बाढ़ और सूखा रोधी धान की प्रजातियों को तैयार किया जा रहा है। इसके अलावा दुनिया भर में धान की खेती वाले क्षेत्रों में होने वाली अत्याधुनिक तकनीक का प्रदर्शन भी किया जाएगा। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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- फोटो : अमर उजाला
चांदपुर स्थित चावल अनुसंधान संस्थान में शुक्रवार को महानिदेशक मैथ्यू मोरेल ने पत्रकारों से बताया कि उत्तर प्रदेश में 12 लाख हेक्टेयर सूखा और 10 हेक्टेयर बाढ़ से खेत प्रभावित होते हैं।
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दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय केंद्र वाराणसी में कम लागत में उच्च गुणवत्ता वाले धान की पैदावार के लिए शोध किए जाएंगे। यहां अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के धान को भारत सहित अन्य देशों के पर्यावरण के हिसाब से तैयार किया जाएगा और यहां की प्रजातियों को विदेशों में भी भेजा जाएगा।
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उन्होंने बताया कि अफ्रीका में कम पानी में पैदा होने वाले धान की प्रजातियों को यहां के अनुकूल किए जाने पर काम चल रहा है। किसानों को जागरूक करने के लिए विशेष प्रशिक्षण के साथ नई तकनीक से भी उन्हें रू-ब-रू कराया जाएगा। कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो पूर्वांचल की भूमि की उत्पादक क्षमता सर्वाधिक है और श्रम भी उपलब्ध है।
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यहां के किसान मोटा धान पैदा करते हैं, जिसके चलते उन्हें कम दाम मिलते हैं। जब यहां अच्छी प्रजातियां विकसित होंगी तो किसानों की आय बढ़ेगी। ऐसे में इस संस्थान के जरिए काशी से दूसरी हरित क्रांति की शुरुआत होगी। इस केंद्र से पूरे साउथ एशिया के किसानों और शोध करने वालों को फायदा होगा। इसके अलावा शुगर फ्री चावल पर भी शोध होगा।
चावल अनुसंधान संस्थान अलग अलग क्षेत्रों में पैदा होने वाले चावल पर अध्ययन कर पौष्टिक चावल तैयार करेगा। इसमें उच्च आयरन और जिंक के तत्वों को विकसित करने के साथ ग्लाइसेमिक इंडेक्स, अर्सेनिक, कैडमियम स्तर को कम करेगा।