ठंड से जरूरतमंदों को राहत पहुंचाने के लिए सरकार ने तो बजट जारी कर दिया, लेकिन ब्लोवर लगाकर सो रहे साहब की लापरवाही से अलाव की व्यवस्था कहीं भी ठीक नजर नहीं आई। राहगीर अब भी ठंडी रातों में ठिठुर रहे हैं। आगे की स्लाइड्स में देखें...
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- फोटो : amar ujala
रविवार रात दस बजे के बाद अमर उजाला की टीम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में रैन बसेरा की व्यवस्थाओं की हकीकत जानने निकली तो नजारा हैरान कर देने वाला मिला, लेकिन साहब को शायद कुछ भी नजर नहीं आता, इसीलिए वह हकीकत से मुंह फेर रहे हैं। उधर, लहरतारा गेट नंबर चार पर ओवरब्रिज का निर्माण चल रहा है। इसके लिए करीब आठ-नौ माह से सेतु निगम ने नगर निगम के रैन बसेरे के एक कमरे को ही अपना दफ्तर बना लिया है।
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रैन बसेरा के बाहर छोटी-छोटी लकड़ियां जल रही थीं। दरवाजा बंद कर रैन बसेरे के अंदर कर्मचारी राम सूरत सो रहा था। आवाज देने पर किसी तरह उठा और दरवाजा खोला। अंदर उसके अलावा दो और लोग अंदर सो रहे थे। गंदे हो चुके रजाई और गद्दे के सहारे वे ठंड से बचाव कर रहे थे। पूछने पर दोनों ने अपना नाम अमित कुमार और वीरेंद्र कुमार निवासी आजमगढ़ बताया। वह दवा लेने आए थे और देर होने से घर नहीं जा सके थे।
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नगर निगम के इस रैन बसेरे में एनजीओ का कर्मचारी जय धारिया रजिस्टर लेकर सो रहा था। उसकी बाइक रैन बसेरे के अंदर खड़ी थी। यहां एक भी व्यक्ति नहीं सो रहा था। हालांकि बाहर रजाई और गद्दा बिछाकर एक व्यक्ति सो रहा था। उसने बताया कि कमरे में दम घुटता है, इसलिए वह बाहर ही सो रहा था। रजिस्टर देखने पर पता चला कि दो दिन पहले चार लोग वहां ठहरे थे। यहां भी रजाई और गद्दे इतने गंदे थे कि पूछिए मत।
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रैन बसेरे का गेट बाहर से बंद था। काफी देर आवाज देने पर वहां तैनात कर्मचारी ने गेट खोला। पहले तो धमक जमाई, लेकिन कैमरा देख सब कुछ समझ गया। खुद का नाम मनोज गौतम बताने वाला यह कर्मचारी रैन बसेरे के कार्यालय में हीटर लगाकर सो रहा था। रजिस्टर देखने पर अधिकांश नाम कागजी लगे, क्योंकि रजिस्टर में अंकित फार्मेट के हिसाब से इंट्री ही नहीं की गई थी।
स्टेशन के बाहर लोग ठंड से परेशान थे। ग्राम विकास अधिकारी की परीक्षा देने के बाद गोरखपुर जाने के लिए करीब 25-30 लोग पुलिस बूथ के बगल में जल रहे अलाव पर कब्जा जमाए थे। उन्होंने बताया कि वे चौरी-चौरा एक्सप्रेस का इंतजार कर रहे हैं जो निर्धारित समय से एक घंटे देरी से रात करीब डेढ़ बजे आएगी। उधर, परिसर में बहुत से गरीब तबके के लोग जमीन पर ही सो रहे थे। कुछ के बगल में कुत्ते सोते और बैठे नजर आए। गरीब तबके के कुछ परिवार कचरे में मिले कपड़ों को जलाकर ठंड से राहत पाने की कोशिश करते दिखे। पूछने पर बताया कि यहां इस बार लकड़ी आई ही नहीं।